Friday, November 12, 2010

एक सुखद अहसास....

ज़ब मैं वाश क्लोथ करके ऐसे क्रोशिये से बने कपड़ों को देखती हूँ तो सचमुच एक सुखद अहसास होता है ......
मैने सबसे पहले कई वर्ष पहले शायद १९८५ में ऐसे बहुत से रुमाल बनाये थे ...यह समझते हुए कि यह टिकाऊ और सस्ते भी पड़ रहे थे ...हर एक रुमाल के कोने में एक छोटा सा क्रिशिये का फूल बना उसे चौकोर कर टांक देती थी ...पुराना होने पर उसे रसोईघर में बर्तन धोने के स्क्रबर के रूप में प्रयोग करती थी या फ़िर बाथ-रूम में नहाने के स्क्रबर के रूप में. मैने यह हिंदी एव इंग्लिश कि पत्रिकाओं में भी प्रकाशित करवाया है...



अब ज़ब देखती हूँ कि ब्लॉग के जरिये संसार के बहुत से देशों में महिलाये यह बनाती हैं ..
और फ़िर हम महिलाओं की प्रक्रति कितनी मिलती-जुलती है


और यह भी कि यह मेरे स्वंय के दिमाग की उपज थी...आयर है... यानी में एक डिजाइनर और अविष्कारक भी हूँ...





देखिये यह मैट, अपने खुद के बनाये कपड़ों के टुकड़ों की डोरियाँ बनाकर बनाई हैं, जिन लीरों को अन्यथा कूड़ेदान में फैंक दिया जाता उनका उपयोग मैने यह खुबसूरत मैट बना कर किया है....

और बड़ी कपड़ों की टुकड़ियों के अप्लिक बनाकर इन्हें सिलाई मशीन से किनारों पर मशीन फेर कुषाण कवर पर टंक दिया फ़िर उन पर फेविक्रिल सिल्वर कलर लगाकर सिलाई को धक् दिया देखिये जल्द बनी और बेकार चीज से बनी यह डिजाइन कितनी खुबसूरत लग रही हैं....










यह पुराने कपड़ों को लीरें बना कर चोटी गूँथ मैट पिछले दिनों बनाई थी ...बड़े काम की हैं....





यह फूल वाली लेस टेबल क्लोथ पर टांकने के लिये बनाई थी...जो अभी तक अधूरी है...कई चीजें रख कर ऐसे भूल जाते हैं कि सालों लग जाते है उसे पूरा करने में.....दिवाली पर इसे बाहर निकाला है शायद अब काम आये...
शब्बा खैर!

No comments:

Post a Comment