Saturday, June 18, 2011

हुसैन का चले जाना My keli.......in front yard,

मकबूल फिदा हुसैन का चले जाना 

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मशहूर चितेरे मकबूल फिदा हुसैन को उनके चाहने वालों का अंतिम सलाम। कला को आम आदमी की चर्चाओं में शुमार करने वाले हुसैन का यूं चले जाना, जैसे आघात के समान है। नई सदी की शुरुआत में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, जिस दुनिया में औसत उम्र 26 बरस आठ माह हो, वहां 95 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदाई बेशक, बड़ी बात नहीं लेकिन जब जाने वाला मकबूल हो, तो दुख का समुद्र उमड़ना लाजिमी ही है। मकबूल ऐसे ही इतने बड़े कलाकार नहीं बन गए। वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए क्योंकि परंपराओं पर चलना उन्हें पसंद नहीं था। कोशिश थी कि बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करने की। लगातार नया करने की उनकी आदत ने उन्हें प्रसिद्धि की शिखर तक पहुंचा दिया। एक दिन, क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी और वह भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए। आर्टप्राइस को यदि प्रसिद्धि का पैमाना मानें तो दुनिया के महंगे कलाकारों में हुसैन का मुकाम 136वां है।
हुसैन पर फिदा थे कला की इस विशाल दुनिया के हजारों-लाखों लोग। इसकी ढेरों वजह हैं। वह किसी कलाकार की तरह यदि संवेदनशील थे तो व्यावहारिक भी। वह जानते थे कि किस तरह चर्चाओं में शामिल हुआ जा सकता है। उनकी चर्चा दोनों ओर होती, आलोचकों के लिए वह एक ऐसे आर्टिस्ट थे जिसे किसी आस्था से सरोकार नहीं और पैसा कमाना ही जिसका ध्येय है। उन पर हिंदू-देवी देवताओं के अश्लील चित्र बनाने का भी आरोप लगा था। 1955 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके बाद पद्म भूषण और राज्यसभा की सदस्यता के लिए मनोनीत होने का बड़ा सम्मान भी हासिल हुआ। भारत से इतना सम्मान और प्रतिष्ठा पाने वाले मकबूल से निराशा तब हाथ लगी जब उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़ दी। दुर्भाग्यपूर्ण उनका बयान भी था कि भारत ने मेरा बहिष्कार किया इसलिये मैं कतर की नागरिकता स्वीकार कर रहा हूं। दक्षिणपंथी संगठनों ने उनके मुस्लिम होने पर नहीं बल्कि कला और अभिव्यक्ति पर हमला किया। मुझ पर हमला हुआ तो सरकार, कलाकार और बुद्धिजीवी सब चुप रहे।
... और चाहने वालों के लिए वह हुसैन थे। वह इतने प्रसिद्ध हो गए, कि उन्हें प्रतिष्ठित फोर्ब्स मैग्जीन ने इंडियन पिकासो का नाम दे दिया। एमएफ हुसैन उन लोगों में से एक थे जो सुंदरता की कद्र करते हैं। प्रशंसक कहते कि पुरातन काल से ही हमारा देश कला का मुरीद रहा है। सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है। मुगल काल में राजा-महाराजा और उच्च घराने कलाकारों को संरक्षण प्रदान कर उनकी कला का आदर करते थे। दुर्भाग्य से आज कलाकृति के सौंदर्य को अश्लीलता कहा जाता है। प्राचीन कला उत्तेजक कलाकृतियों से भरपूर रही है। पुरुष और महिला का आलिंगनबद्ध प्रदर्शन प्राचीन कला का मुख्य आकर्षण रहा है। लेकिन आज नग्नता को सिर्फ अश्लीलता की आंखों से देखा जाता है। मकबूल फिदा हुसैन की पेंटिंग को अश्लील कहने वालों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कटाक्ष किया था। देशभर में उनके विरुद्ध मामलों के स्थानांतरण पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि अदालत में हुसैन के खिलाफ केस दर्ज करने वाले लोग लगता है कभी भी समकालीन कला के दर्शन के लिए आर्ट गैलरी नहीं गए। अगर गए होते तो उन्हें पता होता कि सिर्फ हुसैन ही नहीं बल्कि कई प्रमुख पेंटर नग्नता को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में पेश कर चुके हैं। कुछ भी हो, आर्टिस्ट हुसैन का दुनिया से जाना सचमुच दुखभरी घटना है। मेरी ओर से उन्हें श्रद्धांजलि।




A new  plant I learned about after moving in my house is the Canna Lily. Not a true Lily, again, don't be confused by the common names of plants. They are tall plants with huge leaves and topped by beautiful delicate flowers. Generally the foliage is more impressive than the flowers but many cultivars have been bred to accentuate the flowers.
 When I moved into my new home it was winter so I had to wait till the Spring to see what plants and flowers were planted in my front and back yards.


XOXO


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