Sunday, December 31, 2023

मुंबई का 'अन्नावाड़ी' स्लम


🏙️ चकाचौंध के साए में छुपा एक कड़वा सच...1838 में जो हालात लंदन के स्लम के थे, क्या 2012 में मुंबई के 'अन्नावाड़ी' स्लम के हालात भी वैसे ही थे? कैथरीन बू की मशहूर किताब 'Behind the Beautiful Forevers' और भारतीय झुग्गियों पर लिखी गई कालजयी किताबों की टाइमलाइन पर हमारी नई रिसर्च लाइव हो चुकी है!समय बदल गया, देश बदल गया, लेकिन गरीबी का संघर्ष आज भी वही है। पूरी केस स्टडी पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें। 

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📖 Oliver Twist vs. Dicky Perrott: जन्मजात फरिश्ता या हालात का शिकार?क्या एक बुरा माहौल किसी अच्छे बच्चे को अपराधी बना सकता है? चार्ल्स डिकेंस का मानना था कि आत्मा हमेशा पवित्र रहती है, लेकिन ठीक 58 साल बाद आर्थर मॉरिसन ने अपनी किताब में समाज की एक ऐसी कड़वी हकीकत दिखाई जिसने इतिहास बदल दिया!स्लम लिटरेचर के इस दिलचस्प सफर और इतिहास को समझने के लिए हमारे नए ब्लॉग पोस्ट को अभी पढ़ें। लिंक बायो में है! 👇

My inspirational blog today is underneath...

Adventures in Decorating: DREAM Come True!: G R E E T I N G S, friends! As the Fall bins have been packed away and Christmas boxes are taking over, I couldn't think of a better way...
XOXO

डोमिनिक लापिएरे के कोलकाता से जुड़े कुछ अनछुए संस्मरण (Dominique's Heartwarming Memories)

 जब डोमिनिक लापिएरे किताब 'सिटी ऑफ जॉय' (Anand Nagar) के लिए रिसर्च कर रहे थे, तो उनके जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होंने उनका पूरा नजरिया बदल दिया:

·         स्लम में गुजारे कई साल: 

      डोमिनिक कोई आम विदेशी पर्यटक नहीं थे। उन्होंने कोलकाता के उस बदनाम और बेहद गरीब स्लम में कई साल गुजारे उन्होंने वहां के लोगों के साथ जमीन पर चटाई बिछाकर सोया, वहां का साधारण खाना खाया और मच्छरों भयंकर गर्मी के बीच रहकर उनकी तकलीफों को महसूस किया।

·         कमाई का आधा हिस्सा दान:


       इस किताब से डोमिनिक लापिएरे को जो रॉयल्टी (पैसा) मिली, उसका ठीक आधा (50%) हिस्सा उन्होंने उसी स्लम के लोगों के उत्थान, बच्चों की शिक्षा और कुष्ठ रोगियों (Leprosy patients) के इलाज के लिए दान कर दिया। उन्होंने कोलकाता के स्लम के लिए कई चैरिटी फाउंडेशन भी शुरू किए।


·         "आनंद नगर" नाम क्यों पड़ा?: 


       डोमिनिक अक्सर हैरान होते थे कि इतनी भयानक भुखमरी, बीमारी और तंग गलियों के बावजूद, वहां के लोगों के चेहरों पर हमेशा एक मुस्कान रहती थी। वे त्योहारों को पूरे उत्साह से मनाते थे और एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े रहते थे। इसी 'ह्यूमन स्पिरिट' (मानवीय जज्बे) को देखकर उन्होंने उस स्लम का नाम 'सिटी ऑफ जॉय' (Anand Nagar) रखा। उनका मानना था कि असली अमीर वह नहीं जिसके पास पैसा है, बल्कि वह है जो हर हाल में जीना जानता है।


    xoxo

Happy new year

to all

Wednesday, December 20, 2023

HOSHIAR SINGH YADAV WRITER: नीम

HOSHIAR SINGH YADAV WRITER: नीम:                नीम (मेलिया अजाडिरक्टा या अजाडिरेक्टा इंडिका) भारतीय मूल का पौधा मिलता खूब देश विदेश सदाबहार पौधा कहाए नहीं करता किसी...