Saturday, December 21, 2024

पुरानी ड्रेस से बनाई सुंदर क्रोशिया बास्केट | T-shirt Yarn Basket, Saint Nicholas' Day

क्या आपके वॉर्डरोब (Almirah) में भी ऐसी पुरानी ड्रेसेस या कुर्तियां पड़ी हैं जिन्हें आप अब नहीं पहनतीं? उन्हें फेंकने या बेकार समझने के बजाय, आप उनसे घर के लिए एक बेहद खूबसूरत और काम आने वाली चीज़ बना सकती हैं।

आज के इस ब्लॉग में मैं आपको बताने जा रही हूँ कि कैसे मैंने अपनी एक पुरानी ड्रेस के कपड़े से यार्न (T-shirt/Fabric Yarn) तैयार किया और उससे क्रोशिया (Crochet) की मदद से एक छोटी, सुंदर बास्केट बनाई।


Yarn basket

Materials Needed

·         पुरानी ड्रेस या टी-शर्ट (कॉटन या होजरी का कपड़ा बेस्ट रहता है)

·         कपड़ा काटने वाली कैंची (Scissors)

·         मोटे साइज का क्रोशिया हुक (Moti Crochet Hook - 8mm से 10mm)

 

स्टेप-बाय-स्टेप तरीका (Step-by-Step Process)

स्टेप 1: कपड़े से यार्न तैयार करना (Making the Fabric Yarn)

सबसे पहले पुरानी ड्रेस को चपटी सतह पर फैलाएं। अब कैंची की मदद से कपड़े की लंबी-लंबी पट्टियाँ (लगभग 1 से 1.5 इंच चौड़ी) काट लें। इन पट्टियों को आपस में जोड़कर या बांधकर एक बड़ा सा गोला (Yarn Ball) बना लें। कपड़े को खींचने पर यह एक मोटे धागे या यार्न जैसा रूप ले लेगा।

स्टेप 2: बास्केट का बेस (Base) बनाना

इस बास्केट को बनाने के लिए मैंने सबसे पहले एक मैजिक रिंग (Magic Ring) बनाई। उसके अंदर सिंगल क्रोशिया (Single Crochet) स्टिच चलाते हुए एक गोल बेस (Circle Base) तैयार किया। आप अपनी पसंद के अनुसार बास्केट का बेस छोटा या बड़ा रख सकती हैं।

स्टेप 3: बास्केट की दीवारें (Height) बुनना

जब बेस का साइज सही हो गया, तो मैंने फंदे बढ़ाना बंद कर दिया। सिर्फ हर फंदे में एक-एक सिंगल क्रोशिया करते हुए ऊपर की तरफ बुनाई की। इससे बास्केट को एक कटोरी या टोकरी का आकार मिल गया। आखिरी में धागे को बांधकर सुरक्षित कर दिया।

इस क्रोशिया बास्केट के फायदे और इस्तेमाल (Benefits & Uses)

यह छोटी सी बास्केट दिखने में जितनी सुंदर है, इस्तेमाल में उतनी ही काम की है:

·         ड्रेसिंग टेबल ऑर्गनाइज़र: जैसा कि आप फोटो में देख सकते हैं, इसमें छोटी बोतलें, सीरम, लिपस्टिक या नेलपेंट बहुत अच्छे से जाते हैं।

·         इको-फ्रेंडली और रीसाइक्लिंग: पुराने कपड़ों को लैंडफिल (कचरे) में जाने से रोकने और पर्यावरण को बचाने का यह एक बेहतरीन तरीका है।

·         मजबूत और टिकाऊ: मार्केट की प्लास्टिक बास्केट के मुकाबले यह कपड़े की बास्केट सालों-साल चलती है और गंदी होने पर इसे आसानी से धोया (Wash) जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

पुरानी चीज़ों को नया रूप देने (Upcycling) का मज़ा ही कुछ और है। जब आप अपने हाथों से ऐसी कोई चीज़ बनाती हैं, तो घर की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है।

आपको पुरानी ड्रेस से बनी यह क्रोशिया बास्केट कैसी लगी? क्या आपके पास भी ऐसा कोई रीसाइक्लिंग आइडिया है? मुझे नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं और इस पोस्ट को अपनी उन सहेलियों के साथ शेयर करें जिन्हें क्रोशिया करना पसंद है!



Saint Nicholas' Day
19 दिसंबर को मनाया जाने वाला सेंट निकोलस डे मुख्य रूप से उन ईसाई समुदायों (विशेषकर पूर्वी रूढ़िवादी चर्च जैसे कि रूस, सर्बिया और यूक्रेन) से जुड़ा है जो 'पुराने' जूलियन कैलेंडर का पालन करते हैं। पश्चिमी देशों में यही पर्व 6 दिसंबर को मनाया जाता है।यह दिन चौथी शताब्दी के बिशप निकोलस ऑफ मायरा को समर्पित है, जिन्हें उनकी दयालुता और गुप्त रूप से उपहार देने की आदत के लिए जाना जाता है.इस दिन की मुख्य बातें और परंपराएँ: उदारता का प्रतीक: सेंट निकोलस को बच्चों, नाविकों और गरीबों का संरक्षक माना जाता है। सबसे प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, उन्होंने एक गरीब पिता की तीन बेटियों के विवाह के लिए गुप्त रूप से सोने की थैलियाँ उनके घर फेंकी थीं, जिससे उन्हें गुलामी से बचाया जा सका। उपहार देने की परंपरा: बच्चे रात को अपनी जूतियां (shoes) या मोजे बाहर रखते हैं। मान्यता है कि सेंट निकोलस रात में आकर अच्छे बच्चों के जूतों में मिठाइयाँ, फल या सिक्के भर देते हैं, जबकि शरारती बच्चों को कोयला मिलता है। सांता क्लॉज़ का मूल: आधुनिक 'सांता क्लॉज़' की छवि सेंट निकोलस से ही निकली है। डच भाषा में उन्हें 'Sinterklaas' कहा जाता था, जो अमेरिका जाकर 'सांता क्लॉज़' बन गया। धार्मिक महत्व: कई रूढ़िवादी देशों (जैसे सर्बिया) में इसे 'स्लावा' (Slava) के रूप में मनाया जाता है, जहाँ परिवार इकट्ठा होकर दावत करते हैं और विशेष प्रार्थनाएँ करते हैं। i read this blogpost about its tradition A Yankee-in-Belgrade: Sveti Nikola or Saint Nicholas' Day A Yankee-in-Belgrade: Sveti Nikola or Saint Nicholas' Day: December 19th is Saint Nikola's Day, according to the Serbian Orthodox Church calendar. Each Orthodox Serbian family has a patron saint...

XO

Thursday, December 12, 2024

Pictures speak... if only one has the eye to listen.


Today, I stumbled upon this picture on my computer, and the 20-year journey of my research flashed before my eyes. This photo is from 2016, during a trip to Jaipur with my NGO colleagues. The grace and hard work of the woman I met near a farmhouse made me pause right there.


Raajasthani women with organic dungcake basket on her head.



As a researcher, my connection with Valmiki Nagar began in 2001 when I approached Rajasthan University for my PhD under Dr. M. Kapur. After a long struggle with university rules and equivalence, my admission was confirmed in 2004. During my fieldwork in 2005-06, I was deeply impressed by a woman who had passed 12th grade. She lived a very organized life, had secured her boundary, and managed her own water supply. Seeing her, I believed education would transform the slums.

However, the 'Decadal Change' study in 2016 revealed a bitter reality. That same woman had become an 'Anganwadi worker' in the same slum. Our first Prime Minister, Pandit Nehru, once seeing the slums of Kanpur, spoke of burning them down to build anew (Eradication). But today's system focuses on making them permanent by providing minor facilities. This journey from 2005 to 2026 is now taking the shape of a book and research papers.

XO