Saturday, September 24, 2016

महान संत कवि बुल्ले शाह

सूफी परंपरा में प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट साधना है।  इसमें भी वे संयोग के आनंद की जगह विरह की तड़प को महत्त्व देते हैं।  सूफी सन्तों का मानना है कि विरह की अग्नि ही ह्रदय की सारी कालिमा को पिघला कर बाहर निकाल देती है। ऐसा होने के बाद ह्रदय में हमेशा से मौजूद खुदा के दीदार होने लगते हैं। 
सूफी खुदा को सातवें आसमान पर नहीं कण -कण में व्यापत मानते हैं, कुछ भी तो ऐसा नहीं है, जिससे खुदा का नूर न चमकता हो। बुल्ले शाह को गुरु ने यही उपदेश तो दिया है। ......... 
रब  तैतो  बंदेआ दूर नईं ऊं, पर मिलन दा ए दस्तूर नईं ऊं 
जद  तक न खुदी मिटाएंगा, तद तक न रब नू पाएंगा 
बुल्लेआ रब दा  तू  की पावना ए 
एददरों पुट्टनां तै एददर लावना ए.
आध्यात्मिक साधना का सार है यह पद्द्यजो बुल्ले शाह को गुरु ने धान रोपते-रोपते कहा था। बुल्लेशाह ने इसी को,  संभवतया अपना आदर्श मानकर अपनी रचनाओं में बांधा। 

संत -परंपरा के अन्य महापुरुषों की तरह बुल्लेशाह भी बाहरी आडंबर को पूरी तरह से नकारते हैं। उनके अनुसार,यदि बाह्य साधनाएं अपने परम उद्देश्य-सत्य की अनुभूति से भटककर मात्र रीति -रिवाज़ और क्रमकांड तक ही सिमित हो जाती हैंतो वह बेकार हैं। इसी तरह उन्होंने चमत्कारों को भीजिनकी और धार्मिक लोगों का मन आसानी से प्रवाहित होता है स्वीकार नहीं करतेक्योंकि वे मानते हैं कि ये सिद्धियां भौतिक पदार्थ के संदर्भ में ही होती हैं, उनका स्वरूप बोध से कोई लेना-देना नहीं है। 
xoxo

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