अक्टूबर 2012 की बात है, कुछ पढ़ते हुए मेरे सामने 'Juxtaposition' शब्द आ गया और फिर मैं उसके असली मीनिंग को ढूंढने की गहराई में चली गई थी. उस खोज के दौरान ही मेरे सामने लेबनान की यह विचारोत्तेजक तस्वीर आई थी, जिसमें फोटोजर्नलिस्ट स्टीव मैकरी ने एक टैंक पर खेलते बच्चों को कैद किया था. यह तस्वीर इस शब्द का एक बेहद शक्तिशाली और दर्दनाक उदाहरण थी, जहाँ युद्ध के एक क्रूर साधन और बचपन की मासूमियत को एक साथ रखकर दुनिया के सामने वहाँ के विरोधाभास को लाया गया था. 1982 के उस दौर में लेबनान एक भयानक गृहयुद्ध और इज़राइल के सैन्य आक्रमण से जूझ रहा था, जहाँ बच्चों के खेल के मैदान भी युद्ध के साए से अछूते नहीं थे.
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| Where playgrounds were made of steel: Remembering Lebanon's past as history echoes into the present |
सालों बाद आज जब मैं दोबारा लेबनान की स्थिति पर नज़र डालती हूँ, तो इतिहास और वर्तमान का एक और गहरा Juxtaposition सामने आकर खड़ा हो जाता है. आज का लेबनान न केवल अपने इतिहास के सबसे भीषण आर्थिक और राजनैतिक संकट से घुट-घुट कर जीने को मजबूर है, बल्कि आज कल इज़राइल और लेबनान के बीच का पुराना सैन्य टकराव और तनाव फिर से उसी चरम पर पहुँच चुका है. सीमा पर होते हवाई हमलों और गोलाबारी को देखकर ऐसा लगता है मानो इतिहास का वह काला पन्ना आज फिर खुद को दोहरा रहा है. 1982 में जहाँ लेबनान के लोगों के सामने केवल गोलियों से अपनी शारीरिक सुरक्षा का संकट था, आज उनके सामने अंदरूनी बदहाली और बाहरी युद्ध की यह दोहरी मार है. जो मासूमियत और बारूद का विरोधाभास मैकरी की उस पुरानी तस्वीर में था, वही अनिश्चितता आज भी वहाँ के बच्चों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है, जो दिखाता है कि दशकों बाद भी कुछ जख्म और जीवन के विरोधाभास आज भी उतने ही अधूरे और दर्दनाक हैं.
xoxo

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