Friday, August 5, 2016

तीज


तीज के दिन गाँव में सुबह -सवेरे नहा -धोकर सब लोग रंग-रँगीले कपड़े पहन लेते थे लड़कियां और बहुएं रात को ही अपने-अपने हाथों में मेहँदी रचा लेती थी। गाँव में सुबह तकरीबन सबके घरों में हलवा और खीर बनते थे। हलवा-खीर खाकर सभी लड़कियां और औरतें सावन के गीत गाती  हुई फ लसे में पेड़ों पर टँगे झूलों पर झूलने निकल पड़ती थी।  झूले इतने मोटे -मोटे रस्सों से डाले जाते थे कि टूटने का कोई अंदेशा ही नहीं रहता था झूले के दोनों ओर  रस्सियाँ बाँधी जाती थी जिससे झूलने वाली को लम्बा झुलाने के लिए दोनों तरफ से रस्सियाँ पकड़ कर पींग चढ़ाई जाती थी सब बारी-बरी से झूलते थे अपनी बारी का इन्तजार करती लड़कियां खूब गीत गाती और हंसी- ठिठोली करती थी. शाम को सबके घर सुहाली, गुलगुले पकौड़े और पुड़े इत्यादि बनते थे
 तीजों का एक और रिवाज होता था कोथली  भेजने और आने का चूँकि हमारे गाँव के लोगों ने आर्य- धारण कर रखा था हमारे गाँव के लोग अपनी लड़कियों को कोठली नहीं भेजता थे परन्तु बहुओं के पीहर से कोथलियाँ आया करती थी  कोठली में सुहालियाँ पतासे प्रमुख होते थे इसके साथ ही सुन्दर सी जुले पर लगाने वाली सीधी और बहुओं और उनके बच्चो के कपड़े होते थे। 

जब मैं छोटी थी मेरी दादी इतनी सुहालियाँ बनाती थी कि वे महीनों तक खराएब नहीं होती थी और हम उन्हें महीना भर खूब चाव से खाया करते थे। सरसों का तेल गाँव के कोल्हू से ही बनवाया जाता था।  हमारी हवेली के आस -पास की मुसलमानों के घर थे।  मेरी दादी बताती थी कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बनते समय उन मुस्लिम घरों को हमारे परिवार ने अपने सरंक्षण में यहीं गाँव में रख लिया था।  एक परिवार तो हमारे बड़े दरवाजे के बिलकुल पास ही था उसका नाम सौदागर था वह रुई पिनान का काम करता था। उससे थोड़ा आगे चलकर लीलगरान का घर था वे कपड़ा और सूत रँगने का काम करते थे.उनके थोड़ा आगे चलकर कर-पांच परिवार थे जिनमें से अजमेर के पास कोल्हू था वह सरसों पीड़कर तेल निकालने का काम करता था एक विधवा महिला शबनम थी उसकी पांच बेटियां थी उसकी एक ब्याही हुई लड़कीजमालो अपने ससुराल के परिवार के साथ  पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थी. वह कई बार पकिस्तान से अपनी मां से मिलने हमारे गाँव अपने घर आया करतीय गाँव की सभी महिलाएं उसे मिलने और पाकिस्तान के बारे में जानने उसके घर जाया करती थी। 




आज तीज की बात हिंदुस्तान पाकिस्तान पर जाकर खत्म हुई हमारे देश का आजादी के बाद दो हिस्सों में बांटा  जाना सचमुच एक त्रासदी थी।      

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Monday, August 1, 2016

My Slide show

  i created this slide show in 2011



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भारतीय झुग्गियों (Indian Slums) पर लिखी गई 3 कालजयी किताबें और उनका इतिहास

  
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नमस्ते दोस्तों!
पिछले ब्लॉग में हमने देखा था कि कैसे 19वीं सदी के विक्टोरियन लंदन के स्लम को डिकेंस और आर्थर मॉरिसन ने अपनी किताबों में उतारा था। उस पोस्ट के बाद, कई पाठकों ने मुझसे पूछा कि "क्या आधुनिक भारत के स्लम पर भी ऐसी ही कोई प्रामाणिक किताबें लिखी गई हैं और वे कब प्रकाशित हुईं?"
आज का यह विशेष ब्लॉग उसी जिज्ञासा का जवाब है। मैंने भारत के झुग्गी-झोपड़ी जीवन, वहां के संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं पर लिखी गई 3 सबसे प्रसिद्ध किताबों और उनके प्रकाशन के इतिहास को खंगाला है। आइए इन्हें सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं:

1. "The City of Joy" (आनंद नगर) — वर्ष 1985
  • लेखक: डोमिनिक लापिएरे (Dominique Lapierre)
  • प्रकाशन वर्ष: यह उपन्यास मूल रूप से फ्रांसीसी भाषा में 1985 में प्रकाशित हुआ था और बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद आया।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह किताब 1970 और 1980 के दशक के शुरुआती दौर के कोलकाता (तब कलकत्ता) के एक स्लम 'आनंद नगर' पर आधारित है।
  • खास बात: यह भारतीय स्लम पर वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली शुरुआती किताबों में से एक है। इस पर 1992 में पैट्रिक स्वेजी स्टारर एक बेहद प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म भी बनी थी।
2. "Behind the Beautiful Forevers" (अन्नावाड़ी) — वर्ष 2012
  • लेखिका: कैथरीन बू (Katherine Boo)
  • प्रकाशन वर्ष: यह बहुप्रशंसित नॉन-फिक्शन किताब फरवरी 2012 में प्रकाशित हुई थी।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 2007 से 2011 के बीच के मुंबई (आधुनिक भारत के वैश्वीकरण के दौर) की कहानी है। लेखिका ने खुद मुंबई एयरपोर्ट के पास स्थित 'अन्नावाड़ी' स्लम में कई साल रहकर इस खोजी पत्रकारिता को किताब का रूप दिया।
  • खास बात: इस किताब ने 2012 में अमेरिका का प्रतिष्ठित 'National Book Award' जीता था। यह दिखाती है कि कैसे 21वीं सदी के चमकते भारत के साए में एक पूरी आबादी कचरा बीनकर गुजारा करने को मजबूर है।
3. "Chinnamani's World" (चिन्नामणी की दुनिया) — वर्ष 2011/2013
  • लेखक: मुकुंद राव (Mukunda Rao)
  • प्रकाशन वर्ष: बेंगलुरु के स्लम जीवन पर आधारित यह किताब 2011-2013 के आसपास सामने आई (अनुवाद और प्रकाशन के विभिन्न चरणों में)।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 21वीं सदी के 'IT हब' कहे जाने वाले आधुनिक बेंगलुरु के स्लम और वहां 'स्लम क्लीयरेंस' (झुग्गी हटाओ अभियान) के दौर की कड़वी हकीकत बयां करती है।
  • खास बात: यह किताब सीधे तौर पर हमें आर्थर मॉरिसन की याद दिलाती है, जहाँ विकास के नाम पर गरीबों को उनकी बस्तियों से बेदखल कर दिया जाता है।

💡 निष्कर्ष: 1838 (लंदन) से 2012 (मुंबई) तक क्या बदला?
अगर हम टाइमलाइन को देखें:
  • चार्ल्स डिकेंस ने 1838 में लंदन का स्लम लिखा।
  • डोमिनिक लापिएरे ने 1985 में कोलकाता का स्लम लिखा।
  • कैथरीन बू ने 2012 में मुंबई का स्लम लिखा।
समय के इस विशाल अंतर के बावजूद, जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि चाहे 1838 का लंदन हो या 2012 का मुंबई—गरीबी, सरकारी तंत्र की उदासीनता, साफ पानी की किल्लत और स्लम के बच्चों का असमय खत्म होता बचपन... सब कुछ आज भी वैसा ही है।



Icreated this slide show in 2011
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Monday, July 18, 2016

Kahan Se Aaye Badra

Here is a very well sung song from “chasme Baddoor”.It was picturised on Vinod Nagpal and Dipti Nawal. Vinod Nagpal incidentally is better known for his role in Indian TV’s first mega serial called “Hum Log” in 1980s, where he played the role of “Basesar”.
 It is sung by Yesudas and Haimanti Shukla. Lyricist is Indu Jain and music director is Rajkamal. The music of Rajkamal reminds me of the music of “Saawan ko aane do” which was a Rajshree Productions movie and a musical blockbuster to boot. Here Rajkamal comes up with another nice musical effort. Frankly, I had never heard about Indu Jain ( the lyricist) and Haimanti Shukla ( the female singer). Yesudas, a living legend of South Indian playback singing, sang very few songs in Bollywood movies, but these few songs have become memorable.

And this song is certainly a memorable song.

It was raining all the day round and
Just making this post has made me feel just a little cooler.

 link of rainy season  in the year is HERE

xoxo