Monday, August 1, 2016

भारतीय झुग्गियों (Indian Slums) पर लिखी गई 3 कालजयी किताबें और उनका इतिहास

  
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नमस्ते दोस्तों!
पिछले ब्लॉग में हमने देखा था कि कैसे 19वीं सदी के विक्टोरियन लंदन के स्लम को डिकेंस और आर्थर मॉरिसन ने अपनी किताबों में उतारा था। उस पोस्ट के बाद, कई पाठकों ने मुझसे पूछा कि "क्या आधुनिक भारत के स्लम पर भी ऐसी ही कोई प्रामाणिक किताबें लिखी गई हैं और वे कब प्रकाशित हुईं?"
आज का यह विशेष ब्लॉग उसी जिज्ञासा का जवाब है। मैंने भारत के झुग्गी-झोपड़ी जीवन, वहां के संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं पर लिखी गई 3 सबसे प्रसिद्ध किताबों और उनके प्रकाशन के इतिहास को खंगाला है। आइए इन्हें सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं:

1. "The City of Joy" (आनंद नगर) — वर्ष 1985
  • लेखक: डोमिनिक लापिएरे (Dominique Lapierre)
  • प्रकाशन वर्ष: यह उपन्यास मूल रूप से फ्रांसीसी भाषा में 1985 में प्रकाशित हुआ था और बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद आया।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह किताब 1970 और 1980 के दशक के शुरुआती दौर के कोलकाता (तब कलकत्ता) के एक स्लम 'आनंद नगर' पर आधारित है।
  • खास बात: यह भारतीय स्लम पर वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली शुरुआती किताबों में से एक है। इस पर 1992 में पैट्रिक स्वेजी स्टारर एक बेहद प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म भी बनी थी।
2. "Behind the Beautiful Forevers" (अन्नावाड़ी) — वर्ष 2012
  • लेखिका: कैथरीन बू (Katherine Boo)
  • प्रकाशन वर्ष: यह बहुप्रशंसित नॉन-फिक्शन किताब फरवरी 2012 में प्रकाशित हुई थी।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 2007 से 2011 के बीच के मुंबई (आधुनिक भारत के वैश्वीकरण के दौर) की कहानी है। लेखिका ने खुद मुंबई एयरपोर्ट के पास स्थित 'अन्नावाड़ी' स्लम में कई साल रहकर इस खोजी पत्रकारिता को किताब का रूप दिया।
  • खास बात: इस किताब ने 2012 में अमेरिका का प्रतिष्ठित 'National Book Award' जीता था। यह दिखाती है कि कैसे 21वीं सदी के चमकते भारत के साए में एक पूरी आबादी कचरा बीनकर गुजारा करने को मजबूर है।
3. "Chinnamani's World" (चिन्नामणी की दुनिया) — वर्ष 2011/2013
  • लेखक: मुकुंद राव (Mukunda Rao)
  • प्रकाशन वर्ष: बेंगलुरु के स्लम जीवन पर आधारित यह किताब 2011-2013 के आसपास सामने आई (अनुवाद और प्रकाशन के विभिन्न चरणों में)।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 21वीं सदी के 'IT हब' कहे जाने वाले आधुनिक बेंगलुरु के स्लम और वहां 'स्लम क्लीयरेंस' (झुग्गी हटाओ अभियान) के दौर की कड़वी हकीकत बयां करती है।
  • खास बात: यह किताब सीधे तौर पर हमें आर्थर मॉरिसन की याद दिलाती है, जहाँ विकास के नाम पर गरीबों को उनकी बस्तियों से बेदखल कर दिया जाता है।

💡 निष्कर्ष: 1838 (लंदन) से 2012 (मुंबई) तक क्या बदला?
अगर हम टाइमलाइन को देखें:
  • चार्ल्स डिकेंस ने 1838 में लंदन का स्लम लिखा।
  • डोमिनिक लापिएरे ने 1985 में कोलकाता का स्लम लिखा।
  • कैथरीन बू ने 2012 में मुंबई का स्लम लिखा।
समय के इस विशाल अंतर के बावजूद, जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि चाहे 1838 का लंदन हो या 2012 का मुंबई—गरीबी, सरकारी तंत्र की उदासीनता, साफ पानी की किल्लत और स्लम के बच्चों का असमय खत्म होता बचपन... सब कुछ आज भी वैसा ही है।



Icreated this slide show in 2011
 My Slide show 


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xoxo

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