Friday, October 28, 2011

Our Diwali Pics Slideshow Slideshow

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Monday, October 24, 2011

wreath (रैथ)

घास की रैथ
मैंने कुछ दिन पहले सामने के दरवाजे पर तांग्ने के लिए एक रैथ बनाई. रैथ का चलन 16वीं शताब्दी में मार्टिन लूथर के सुधारावाड़ के समय जर्मनी में हुआ जब गाड़ी के पहिये के साथ बच्चों को क्रिश्मिस के बारे में समझाया जाता था. रैथ एक गोल लच्छा होता है जिसे विभिन्न तरीकों से सजाया जाता है और इसे सामने के दरवाजे को सजाने के लिए टेंगा जाता है.




मैंने इसे कैसे बनाया:
कुछ दिन पहले हमारे सामने के पार्क में घास की कटाई हुई थी. और वह सूखने के बाद ढेरों इधर-उधर बिखरी पड़ी थी .एक दिन सुबह पार्क के ट्रैक पर सैर करते वक्त मेरी नजर सुखी घास के ढेर पर अटक गई और मैंने इसका कुछ उपयोग करने की सोची और में जितनी एक बार में उठा सकती थी उठाई और घर ले आई कुछ 4-5 दिन बाद शाम को सामने के बरामदे में बैठ मैंने अपनी मम्मी की सहायता से घास का घेरा बनाया. इसके लिए मैंने फिर से बची-खुचि बेकार चीजों का इस्तेमाल किया. प्रेशर कुकर की गैस्कैट पर बेकार पानी की ट्यूब लपेट कर उस पर घास लगाना शुरू किया और उसे गेहूँ की बोरी उधेङ प्राप्त की गई रस्सी लपेटी इस प्रकार घास का एक गोल चक्कर बनाया और उस पर सजावट की इसे बनाने का पूरा ताड़ीका में अगली पोस्ट में विस्तार से पोस्ट करूँगी.
शब्बा खैर!

Friday, October 21, 2011

Chrysanthemum (Guldaudi)


I took the photos of Chrysanthemum(common name guldaudi) in March,17,2010 when they were in ful bloom.somehow i was not able to upload the pictures at that time. Now i am planning to raise them in my backyard(small place in pots). It comes in different variety and colours. It needs sun. Our University (CCSHAU) shows of these flowers are organized.

see the photographs i grabbed in my phone camera...not up-to-the mark

sorry for the poor reflections...



Images Video: Chrysanthemum (Guldaudi) Flowers Photographs: Technorati Tags: Chrysanthemum (Guldaudi) Flowers Photographs
i got this video for beautiful photos to compansate and for eye candy..
Happy Day!

Monday, October 17, 2011

Our Blog | Hollygrove Market and Farm

Our Blog | Hollygrove Market and Farm

remembering village, inspiration


यह उन दिनों की बात है जब मैं छठी कक्षा में पढ़ती थी मुझे आगरा में मिड सैशन में किसी स्कुल में दाखिला नहीं मिला तब मेरे पिताजी ने मुझे और मेरी छोटी बहन को गाँव में छोड़ा गाँव में पांचवी कक्षा तक स्कूल  था अतः मुझे तोशाम के मिडिल स्कुल में दाखिला  दिलवा दिया गया।  गाँव में रहते मैं अपने आस-पास की लड़कियों से जो स्कूल   नहीं जाती थी कुछ न कुछ सीखती रहती थी. उन्हीं दिनों आक के डोडे तोड़ कर  उस में से कपास निकाल कर  उन्हें चरखे पर कात  लिया जाता था 


और उस सूत को रंग कर गलीचे बनाये जाते थे। छुट्टियों में मैं भी मेरी हम उम्र बुआ के साथ आक के दौड़े खेतों की मेंड़ों के किनारों और बणी में से तोड़ कर  लाई और मेरी दादी ने उन्हें काता आक के डोडों की रुई को कातना बहुत मुश्किल होता था मैंने भी कातने की कोशिश की और काफी काता  भी. डोडों में से फाये उड़-उड़ जाते थे और नाक में भी चढ़ जाते थे समय मुँह  पर ढाठा/ कपड़े का नकाब बांन्धना   पड़ता था। खैर मैंने भी एक छोटा सा गलीचा आक के डोडों से बनाया परन्तु वह ज्यादा टिकाऊ नहीं था उसके रेशे  बल नहीं सहन क्र सकते और बल खुल कर उधड़ जाते थे।  फिर उनका रिवाज जाता रहा।  परन्तु हैरान करने वाली बात यह है कि वह गलीचे हरियाणा के हर कोने में बनाये गए थे जैसा कि इस बारे में आज भी मैं हरियाणा के विभिन्न हिस्सों की औरतों से पूछ लेती हूँ। 


यह है हमारे घर का तुलसी का पौधा जो अनायास ही उग आया मैं घर के सामने वाले पार्क से कुछ मिटटी गमलों में भरने के लिए लाई थी वह  मिटटी कुछ दिन पहले पार्क में हुए सत्संग के लिए पूजा की बेदी हेतु लाकर बेदी बनाई गई थी वही तुलसी के पौधों से कुछ बीज शायद उसमें गिर गए होंगे और वह  हमारे गमले में मेरे द्वारा  लगाए पौधे के साथ उग आई।  मैंने काफी दिनों बाद दूध वाले से पूछा कि भैया यह पौधा क्या है तब उसने बताया कि यह तुलसी का पौधा है।  
मैंने इससे पहले तुलसी के बहुत से पौधे नर्सरी से खरीद कर लगाए परन्तु एक भी नहीं  चला  


यह नैट से ली गई आक के पौधे की जड़ है इसे गणपति बताया जाता है 




my inspiration today


Here

xoxo

Wednesday, October 12, 2011

my daughter's writtings,confessions!!!


बड़े दिनों से मैं अपने ब्लॉग पर नहीं  सकी.
कारण?
कंप्यूटर पर का करने की एक दिक्कत है कि खराब होने पर इसकी दवा स्वँय नहीं की जा सकतीऔर एमरजेंसी में उसे डॉक्टर के यहाँ दाखिल करवाना पड़ता है और मेरे पास भी कोई चारा नहीं थामैंने अपने कंप्यूटर को उसके इलाज के लिए हॉस्पिटल में जमा करवा दिया और फिर मेरे घर को सँवारने का सिलसिला जो शुरू हुआ कि में उसे भूल ही गई बस सीमेंटगाराबजरीपेंट ...धूल....कंकड़भयानक शोर.....और मिस्त्रीप्लम्बरपेंटर बस उनकी तो बात ही मत पूछो एक बार घर में घुस गए तो बस ....घर से निकलने का नाम ही नहीं लेते........
बहरहा मेरा कंप्यूटर भी घर  चुका है और मैंने अपने घर की पुताई भी इसी शनिवार को करवा कर इस काम से निजात पा ली हैशायद कुछ छूट-पुट काम रह गया हैवह हमारे "हेंडिमैनके हाथों करवा लूँगी.
आज कुछ  जो मेरी बेटी ने लिखा.....कुछ 2-3 वर्ष पहले जब सोनिया लड़की केलीफोर्निया में अपनी पढ़ाई के दौरान सहायता के लिए हमारे यहाँ आई थी उसके बारे में हैसोनिया अमेरिका में रहती है और जब वह जापान में अँगरेजी पढाती थीउसने कैलिफोर्निया से पत्रकारिता में कोर्स करने की ठानीजब वह जापान से अमेरिका जा रही थी तो उसने अँगरेजी अखबार में मेरी भानजी द्वारा शोध किया लेख पढ़ाजिसमें हरियाणा में महिलाओं के घटते लिंगानुपात का जिक्र था तब उसने अपने पत्रकारिता के एक प्रोजक्ट में इस विषय पर काम करने की ठानी और उसने समय आने पर मेरी भानजी को खोज निकाला और हमसे पूछ-ताछ की हमने उसे बखूबी वेल्कम किया और उसने अपना काम बखूबी दक्षता से निभा लियासोरखी गांव जाकर केरल से ब्याह कर लाईं गई लड़कियों से पूछ-ताछ की और केरल उनके घर जाकर भी अपनी लघु फ़िल्म का कुछ हिस्सा शूट किया.
बेटी को किसी बात पर उसकी अपने काम की जिजीविषा की बात की याद  गई साथ ही अमेरिका में पढाई का  स्तर  भी पता चला क्योंकि उसे उसी काम की त्रुटियों (गाईड द्वारा निकली गई)को दूर करने के लिए दोबारा भारत उसी हरियाणा के गांव आना पड़ा और उसने अखबार में इस बारे में लिखा जो नीचे दिया जा रहा है.
अगली पोस्ट में उसकी फ़िल्म भी अटैच करूँगी.
देखिये यह लिंक !!

शुभ दिवस!!