Tuesday, December 9, 2014

1. कहानी: खबरी बुआ — रिश्तों में मीठी खटपट और गांव का वो देसी मिजाज

"साहित्य समाज का दर्पण होता है और जब बात महिला संवेदनाओं और पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने की हो, तो लेखनी और भी गहरी हो जाती है। 

मुझे यह साझा करते हुए अत्यंत गर्व और हर्ष की अनुभूति हो रही है कि मार्च 2014 में 'हरियाणा साहित्य अकादमी' की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका 'हरीगंधा' के 'महिला विशेषांक' (अंक: 235) में मेरी प्यारी बेटी विपिन चौधरी की एक बेहद खूबसूरत कहानी प्रकाशित हुई थी।


 'हरीगंधा

रिश्तों की कड़वाहट, अपनत्व और पारिवारिक उतार-चढ़ाव को समेटती इस कहानी का शीर्षक है—'समकालीन कहानी: खबरी बुआ' अपनी बेटी की इस अनमोल साहित्यिक यात्रा और उसकी यादों को आज मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी पाठकों के साथ साझा कर रही हूँ। आशा है कि यह कहानी आपके दिलों को छुएगी। आइए पढ़ते हैं कहानी का पहला भाग..."

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समकालीन कहानी

खबरी बुआ

ग्लैंड में क्या करेगी मां, वहां बच्चे के पोतड़े धोएगी और बेटे-बहू की डांट खाएगी।" सुनीता ने आवेश भरी आवाज में कहा, "मैं अच्छे से जानती हूं, निखिल की नकचढ़ी पत्नी और निखिल के गर्म स्वभाव को।"

अपनी पत्नी के आवेश को अनदेखा कर, नवरतन ने जोर से ठहाका लगाया। वह कुर्सी से नीचे झुकते हुए अपने जूते के फीते बांधते हुए बोला, "तुम्हारी मां जो कुछ बोती आई है अब तक, वही तो काटेगी न। बोये बबूल के तो आम कहां से पावे।"

सुनीता ने यह सुन एक बार तो अपनी गर्दन झटकाई। फिर जरा ठहरकर सोचा- नवरतन जो कह रहे हैं, वह कड़वा तो जरूर है, पर है सौ प्रतिशत सच। वह खुद भी तो अपनी मां की कारगुजारियों की साक्षी रहती आई थी। सुनीता की बुद्धि को जो सहज ही समझ में आया, उसके पीछे कारण यह था कि कभी यही मां खुद अपने ही बड़े बेटे निखिल और बहू रितिमा के बीच तनाव का कारण बनी थी और वह तनाव बढ़ते-बढ़ते तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर तक जा पहुंचा था। फिर बहुत कोशिशों के बाद ही दोनों पति-पत्नी में सुलह हो पाई थी। तो सुनीता कैसे उम्मीद करे कि उसकी मां अर्थात खबरी बुआ इंग्लैंड जाकर उसके बड़े भाई के शांत और सुखी परिवार में दोबारा से कोई खुराफात नहीं मचाएंगी। इधर, जब से खबरी बुआ का इंग्लैंड जाने का पक्का प्लान बना है, उसके धरती पर पांव नहीं पड़ रहे। वैसे भी कौन-सी गंभीरता रहती है, बुआ के आचरण में। इस भादो में पूरे 80 के नजदीक लग जाएगी खबरी बुआ, पर चंचलता और शोखी में जवान कन्याओं को माफ करे है वो।

गांव-गुहांड के किसी भी कोने में शादी हो, तो खबरी बुआ की पांव की एड़ियां धरती से टकरा-टकराकर एक अनोखे वाद्ययंत्र का भान देती हैं और साथ-साथ बुआ नाचते-नाचते पूरी तान भी देती चलती हैं। हंसी-खुशी, दुःख, विरह के तमाम गीत खबरी बुआ को मुंहजबानी याद हैं।

जब वह अपनी भारी-भरकम आवाज में शादी-ब्याह की महफिलों में गाने लगती हैं तो गांव की नई-नवेली बहुएं घूंघट से चेहरा बाहर निकालकर झांककर इस आवाज की तरफ देखने लगती हैं। गांव में ब्याह कर आई इन नई-नवेली बहुओं के पास भी देर-सवेर इस तेज-तर्रार खबरी बुआ का बायोडाटा पहुंच जाता है। वे भी...

राजेंदर की पत्नी ही थी, जो बुआ से ठीक से पेश आती। जवान मौत के गम से पूरा घर शोक में डूबा हुआ था, पर इस वक्त भी शांति बुआ अपनी करतूतों से बाज नहीं आई और राम की पत्नी के कान भर दिए कि छोटी बहू की पत्नी को तेरे पति के पल्ले बांधेंगे। यह सुनकर राम की पत्नी और उसके मायके वाले बिदक गए, जबकि पल्ले उड़ाने वाली बात सिर्फ बुआ ने ही अपनी जुबां से निकाला था और राजेंदर तो खुद ऊंचे विचारों वाले इन्सान थे। उन्हें इस तरह की प्रथाओं में रत्ती भर भी विश्वास नहीं था।

बुआ के खबर देने का अंदाज तो ऐसा जबरदस्त होता कि ललिता पंवार या निरुपमा दत्त की अदाकारी भी उसके आगे पानी भरे। जिस तरह गांव में घूम-घूमकर चूड़ियां बेचने वाली मनियारन अपने सिर से चूड़ियों का छाबड़ा उतारती है, उसी तरह से खबरी बुआ गांव के भीतर घुसते ही अपनी खबरों का पिटारा पहले से ही तैयार रखती है। किसी काबिल तीरंदाज का तीर निशाने पर लगे लगे, खबरी बुआ अपनी खबर से जो तीर किसी शांत घर में छोड़ती है, वह अपना असर जरूर दिखाता है।

लड़ाई-झगड़े के कई बड़े-बड़े कांड इसी खबरी बुआ के नाम पर दर्ज हैं। फिर भी आठों घरों की बहुएं उनके आगे नत-मस्तक रहती हैं। देर तक उनींदी हालत में भी खबरी बुआ के पांव दबाने में झुकी हुई देखी जा सकती हैं, उस वक्त तक जब तक खबरी बुआ, बस का इशारा कर दे। यही नहीं खबरी बुआ होने के और भी कई फायदे हैं। मसलन, घर-भर के बच्चों को दरकिनार कर सबसे पहले खबरी बुआ को ही गरमा-गरम खाना परोसा जाता है। घर में बिजली होने पर बुआ को पंखा झलने का फरमान जारी होता है, जिसे घर के बच्चों को कुढ़ते हुए मानना ही पड़ता है। हर बार गांव आने पर खबरी बुआ इसी तरह से मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाकर अपने शहर वाले घर लौट जाती है, पीछे रह जाता है गांव का कोई लड़ता-झगड़ता घर, जिसमें खबरी बुआ अपनी किसी खबर के कीटाणु छोड़कर एक शातिर खिलाड़ी की तरह लौट गई होती है।

वैसे बुआ अरसे से शहर में रहती है, पर उनका असली राजपाट तो सुजानपुरा गांव में ही चलता है। शहर की पड़ोसनें तो खबरी बुआ को घास का एक तिनका भी नहीं डालतीं। तो शहर में बुआ का मन क्योंकर लगे। हर हफ्ते कपड़ों की पोटली बगल में दबाए बुआ गांव के किसी किसी घर में धमकती है। उसे उस घर में जाना अधिक सुहाता है, जिसमें कोई शादी या सगाई या फिर नन्हा मेहमान आने की तैयारी हो रही होती है।

गांव की औरतों की घरेलू राजनीति भी बेहद रोचक हुआ करती है, जिसका पूरा का पूरा लाभ खबरी बुआ उठाती है। गांव के घरों में आपसी भाईचारे का माहौल होता है। वह शहर में बुआ को किसी भी हालत में नसीब नहीं हो सकता। गांव की बड़ी-बूढ़ी भी खबरी बुआ की शैतानियों से पार नहीं पा सकीं हैं, फिर इन नई लड़कियों और बहुओं की तो बात ही क्या है। जब सावित्री बुआ तेरह बरस की उम्र में इस गांव की हवेली में ब्याहकर आई थी तो डोली इसी खबरी बुआ के घर में उतरी थी। तब से देख रही है सावित्री, खबरी बुआ का रुतबा कम नहीं हुआ है इस घर में। घर क्या, पूरे खानदान क्या, पूरे गांव में। समय के साथ सावित्री ने अपने आठों छोटे देवरों की शादियां देखीं। नई बहुएं पुरानी हवेलियों में आईं। फिर सबने उस पुरानी हवेली को छोड़ अपने-अपने परिवार के साथ अपने घर-आंगन अलग कर लिए।

इस बीच खबरी बुआ के जलवे गांव के चारों कोनों तक पहुंचे। गांव के हर घर में बुआ की मेहरबानी से लड़ाई-झगड़े होते रहे। दरअसल बात यह थी कि बुआ के अपने आठों भाइयों में से सिर्फ दो भाइयों को ही खबरी बुआ की कृपादृष्टि प्राप्त थी। बुआ की कारगुजारियों के कारण इस सहारन परिवार में भाइयों के बीच खटपट का वातावरण हमेशा चलता रहता। शायद ही इस परिवार में कोई ऐसी शादी हुई हो जब सभी भाइयों के परिवार एक साथ हंसी-खुशी के अवसर पर जुटे हों।

खुद खबरी बुआ का अपना शहर का घर भी क्लेश से कहां महरूम था। शायद बुआ का प्रभाव ही ऐसा था कि क्लेश उसके घर की दिनचर्या में शामिल हो चला था। उसके चारों लड़के इस कदर लड़ते कि जब कभी लड़ते-लड़ते चारपाइयों पर गिर पड़ते तो चारपाइयों के चारों पाये धराशायी हो जाते। फिर नीचे गद्दे बिछाकर सोने की नौबत जाती। तो कभी दीवार घड़ी की बलि चढ़ जाती, उनके लड़ने की जोर-आजमाइश में। किशन फूफा भी शायद इसी कारण अपना समय घर से बाहर गुजारा करते। खूब शराब पी घर आते और अपनी तनख्वाह का छोटा-सा हिस्सा ही बुआ को थमाते। खबरी बुआ भैंसों का दूध और उपले बेचकर गुजारा करती।

निरक्षर खबरी बुआ को दुनियादारी का जटिल पहाड़ा मुंहजबानी याद था। वह संसार के सारे पेंच अपनी कुटिल कुंजी की सहायता से फटाफट खोल लिया करती थीं। यही कारण था कि अपनी काली-कलूटी फूहड़ बेटी, जिसके भरी जवानी में ही बत्तीस में से बीस दांत भगवान को प्यारे हो चुके थे, की शादी एक बड़े अफसर से सफलता से करवा दी थी और ऐसा हट्टा-कट्टा गऊ जैसा दामाद ढूंढकर निकाला कि आसपड़ोस की सभी जवान कुंवारी लड़कियों की माएं दांतों तले अपनी उंगलियां दबाने को मजबूर हो गईं।

यह भी गजब संयोग ही था कि घर के क्लेशपूर्ण वातावरण में भी पढ़-लिखकर खबरी बुआ का बड़ा बेटा काबिल होकर इंडियन फोरेन सर्विस में प्रवेश पा गया। तब वह खबरी बुआ की काऊ-काऊ कर शोर मचाती दुनिया से दूर निकल गया और दोनों बेटे भी स्कूल में मास्टर हो दूसरे शहर में चले गए। रह गया सबसे छोटा और सीधा बेटा शांतनु, जो बेचारा मुश्किल से बी.. ही पास कर पाया। अब घर का सारा कामकाज उसके ही कमजोर कंधे पर था। दिनभर बुआ के निर्देशों का पालन करता शांतनु कभी बुआ की रुआब से दूर नहीं जा पाया। उसके लिए बहू भी चुनकर लाई थी खबरी बुआ। जो बेचारी गरीब घर की कम समझ वाली ऐसी लड़की थी, जो कभी भी बुआ का विरोध नहीं कर सकती थी। यह सब भी बुआ की उस चाल के तहत मामला था, जिससे कि आखिरी सांस तक खबरी बुआ का प्रभुत्व फीका पड़ सके। हर सिरे पर चौकन्नी रहती थी खबरी बुआ, मजाल कि उसका फेंका हुआ पत्ता कभी गलत सिद्ध हो जाए।

फिलहाल खबरी बुआ खाट पर बैठकर बता रही है कि उसके सूटकेस में क्या-क्या डाला जाए। कभी किसी बच्चे तो कभी किसी बहू को दौड़ा-दौड़ाकर हलकान कर रही है। शायद गांव की ये महिलाएं खबरी बुआ के विदेश जाने से राहत की सांस ले सकें, पर उन महिलाओं की तादात भी कम नहीं है, जिनको खबरी बुआ की खबरों की छूटने वाली लत लग चुकी है। अलबत्ता घर की सबसे नई पीढ़ी खबरी बुआ को देखकर नाक-भौं सिकोड़ती हुई साफ देखी जा सकती है और तो और छोटे बच्चे भी अपनी तेज इनर इंस्टिंक्ट के चलते खबरी बुआ से दूर ही रहते हैं। अपने माता-पिता के हाव-भाव देखकर शायद वे खुद ही कोई अनुमान लगा लेते हों खबरी बुआ के बारे में। जो उनसे झटके रहने का कारण बनता हो।

अब इस इक्कीसवीं सदी में खबरी बुआ का खबरों का लंबा-चौड़ा कारोबार भी कुछ मंद-सा पड़ने लगा है। कारण यह भी है कि अब लगभग सभी बुड्ढे-बढ़े लोग सुजानपुरा गांव को छोड़कर अपने बच्चों के पास शहर में चले गए हैं और कुछ लोगों ने अपने दूर-दराज के खेतों में ही डेरा डाल लिया है, जहां घर गांव के घरों की तरह एक साथ जुड़े होकर अलग-अलग खेतों में बने हुए हैं।

अब देखना यह है कि खबरी बुआ का इंग्लैंड प्रवास कैसा रहेगा। कितने दिन टिक पाएंगी वह परदेश में। क्या रह-रहकर उसे लड़ाई-झगड़े की आवाजें सुजानपुरा गांव आने को मजबूर कर देंगी?

खबरी बुआ के वापिस भारत आने तक हम उन पर आधारित इस सत्यकथा को यहीं पर विराम देते हैं।

Concluding Note:

रिश्तों के इस ताने-बाने और 'खबरी बुआ' के इस अनोखे अंदाज़ को बयां करती मेरी बेटी विपिन चौधरी की यह रचना आपको कैसी लगी? कमेंट बॉक्स में अपनी राय और समीक्षा ज़रूर साझा करें। आपके विचार हमारे लिए बेहद अनमोल हैं!


 XOXO





















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