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Sunday, September 15, 2013

मेरा गांव: खरकड़ी माखवान (संस्कृति, परंपरा और इतिहास का संगम)

भौगोलिक परिचय:

गांव: खरकड़ी माखवान  

तहसील :तोशाम

जिला :भिवानी

राज्य : हरियाणा

डाकखाना  :तोशाम

पिन कोड  : 127040

आस-पास के समीपवर्ती गांव: झांवरी (1 किमी.), लक्ष्मनपुरा (1 किमी.), सरल (3 किमी.), खरकड़ी सोहन (3 किमी.), बागनवाला (3 किमी.), थलोड़ (7 किमी.), सागवान (8 किमी.), दुल्हेड़ी (8.5 किमी.), और पटौदी (10.5 किमी.)।

1. स्मृतियों का चबुतरा: पटवारी वाला चबुतरा

2. हरियाणा की अनूठी परंपरा: कोरडामार होली
 

जैसे ब्रज और बरसाने की लट्ठमार होली प्रसिद्ध है, ठीक उसी तर्ज पर हमारे गांव और हरियाणा में 'कोरडामार (कोड़ामार) होली' बड़े हर्षोल्लास से मनाई जाती है.

कपड़े को ऐंठकर और भिगोकर एक मजबूत रस्सी (कोड़ा या कोरड़ा) का रूप दिया जाता है. गांव की महिलाएं इन कोरडों से होली खेल रहे पुरुषों पर स्नेहिल प्रहार करती हैं, जबकि पुरुष पानी, गुलाल और लाठियों के सहारे बचाव करते हुए इस उल्लास का आनंद लेते हैं.


  हरियाणवी कोरडामार होली: स्नेह, हास-परिहास और पारंपरिक रीति-रिवाजों का अनूठा उत्सव.

कहते हैं कि भाभी अपने देवर की मरोड़ खत्म करने के लिए कोरडे मारती हैं और हंसते हुए कहती हैं— "इस कोरडे से तेरी सारी मरोड़ खत्म कर दूंगी!" इसमें न केवल आपसी हास-परिहास है, बल्कि यह साल भर की खट्टी-मीठी कसक को भुलाकर आत्मीयता बढ़ाने का एक अनूठा माध्यम है. बच्चे, बूढ़े और जवान—सभी इस रंग में सराबोर हो जाते हैं. इस जीवंत परंपरा को देखने और खेलने के लिए दूर-दूर से लोग गांव खिंचे चले आते हैं.


3. सामाजिक सुधार की मशाल: आर्य समाज मंदिर और ऐतिहासिक योगदान

यह हमारे गांव का ऐतिहासिक आर्य समाज मंदिर है. हमारे गांव खरकड़ी माखवान में समाज सुधार और शिक्षा की अलख जगाने के लिए सबसे पहले आर्य समाज के विचारों को अपनाया गया था.

ऐतिहासिक आर्य समाज मंदिर: सन 1907 के सामाजिक पुनर्जागरण और वैचारिक चेतना का प्रतीक.

सन 1907 में मेरे परदादा (great grand father) चौधरी स्योराम जी आर्य समाज के प्रधान चुने गए थे. उसी वर्ष (1907) हमारे गांव में एक विशाल आर्य समाज कांफ्रेंस का आयोजन हुआ था, जिसमें देश के कई महान विद्वानों और समाज सुधारकों ने भाग लिया था. उस दौर में सामाजिक और शैक्षिक पुनर्जागरण के लिए मेरे परदादा जी ने 100 रुपये की सहयोग राशि दान की थी, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी.

हमारे गांव का यह आर्य समाज मंदिर आज भी उस गौरवशाली इतिहास, संस्कारों और वैचारिक चेतना का प्रतीक बनकर खड़ा है.

शब्बा खैर!