Monday, August 8, 2016

तोशाम के पहाड़ों पर मुंगीपा धाम की पवित्र यात्रा & Bhagavad_Gita







दोस्तों, आज मैं आपको एक बहुत ही पवित्र और ऐतिहासिक स्थान की सैर पर ले चलती हूँ—तोशाम, हरियाणा में स्थित मुंगीपा धाम. यह पहाड़ों के बीच बसा एक ऐसा देवस्थान है जहाँ जाकर मन को असीम शांति मिलती है.

आपके साथ इस यात्रा के अनुभव को साझा करने के लिए मैंने वहाँ की सभी प्रमुख तस्वीरों का एक सुंदर कोलाज बनाया है, ताकि आप सभी दृश्यों को एक साथ देख सकें:



जैसा कि आप इस फोटो कोलाज में देख सकते हैं, हमारी यात्रा पहाड़ों पर चढ़ाई के साथ शुरू हुई. रास्ते में पुराने पेड़ और विशालकाय चट्टानें इस यात्रा को और भी रोमांचक बना रही थीं.

धाम पर पहुँचते ही, सबसे पहले हमने उस पवित्र कुण्ड का दर्शन किया, जिसके लिए यह जगह जानी जाती है (कोलाज के बीच में). यह माना जाता है कि मुंगीपा ऋषि ने यहाँ तपस्या की थी और इस कुण्ड के पानी में स्नान करने से सभी रोग दूर हो जाते हैं. पहाड़ी गुफा के अंदर का ठंडा पानी और शांत वातावरण मन को मोह लेता है.

कुण्ड के पास ही ऋषि की गुफा और मंदिर स्थित है, जहाँ हमने पूजा-अर्चना की. वहाँ की शांति और धार्मिक माहौल ने हमारी आत्मा को तृप्त कर दिया.

तस्वीरों में आप यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर विश्राम करते और यादें संजोते हुए दृश्य देख सकते हैं. यह यात्रा न केवल आध्यात्मिक थी, बल्कि परिवार के साथ बिताए गए कुछ बेहतरीन पलों में से एक बन गई.

अगर आप भी किसी शांत और आध्यात्मिक स्थान की तलाश में हैं, तो तोशाम के मुंगीपा धाम की यात्रा एक बार ज़रूर करें.


XOXO

Sunday, August 7, 2016

my daughter's poems in haryanvi

My daughter
किसी भी रचनाकार के लिए उसकी देशजता सबसे अहम होती है। अपनी रचनाओं के लिए खाद-पानी वह वहीँ से आजीवन जुटाता है। अपनी देशज बोलियों के ऐसे शब्द जिनका अक्स दूसरी बोलियों में प्रायः नदारद होता है, अपनी कविताओं में ला कर न केवल कविताओं की जमीन को पुख्ता करता है, बल्कि देश-दुनिया को भी एक नए शब्द की आभा से परिचित कराता है। हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में कवि केदार नाथ सिंह ने कहा था कि मेरी एक इच्छा है कि मेरा एक कविता संग्रह मेरी देशज भाषा भोजपुरी में आए। लेकिन यह अभी तक संभव नहीं हो सका है। संयोगवश हमारे युवा साथी अपनी देशजता के प्रति सजग हैं। विपिन चौधरी हिंदी कविता में आज एक सुपरिचित नाम है। कविताओं के साथ-साथ विपिन कहानियाँ और अनुवाद के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। आज हम आपको विपिन की उन हरियाणवी कविताओं से परिचित करा रहे हैं जो उनकी अपनी बोली-बानी है। जिसमें वे बेझिझक अपने को व्यक्त कर अपनत्व महसूस करती हैं. तो आइए पहली बार पर पढ़ते हैं विपिन चौधरी की कुछ हरियाणवी कविताएँ।            

विपिन चौधरी की हरियाणवी कविताएँ  



बाट

कोए आण आला सै 
छोरी आंखया की ओट तै बोली

मुंडेर पर बैठा
मोर किस बाट में नाचया 

दादाजी हुक्के में
चिलम मह चिंगारी की बाँट देख छोह मह आए 

बालक
नै सपने में
नई पतंग की बाट देखयी

बाट बाट मह
तो या दुनिया गोल होई 


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xoxo

Friday, August 5, 2016

तीज


तीज के दिन गाँव में सुबह -सवेरे नहा -धोकर सब लोग रंग-रँगीले कपड़े पहन लेते थे लड़कियां और बहुएं रात को ही अपने-अपने हाथों में मेहँदी रचा लेती थी। गाँव में सुबह तकरीबन सबके घरों में हलवा और खीर बनते थे। हलवा-खीर खाकर सभी लड़कियां और औरतें सावन के गीत गाती  हुई फ लसे में पेड़ों पर टँगे झूलों पर झूलने निकल पड़ती थी।  झूले इतने मोटे -मोटे रस्सों से डाले जाते थे कि टूटने का कोई अंदेशा ही नहीं रहता था झूले के दोनों ओर  रस्सियाँ बाँधी जाती थी जिससे झूलने वाली को लम्बा झुलाने के लिए दोनों तरफ से रस्सियाँ पकड़ कर पींग चढ़ाई जाती थी सब बारी-बरी से झूलते थे अपनी बारी का इन्तजार करती लड़कियां खूब गीत गाती और हंसी- ठिठोली करती थी. शाम को सबके घर सुहाली, गुलगुले पकौड़े और पुड़े इत्यादि बनते थे।
 तीजों का एक और रिवाज होता था कोथली  भेजने और आने का चूँकि हमारे गाँव के लोगों ने आर्य- धारण कर रखा था हमारे गाँव के लोग अपनी लड़कियों को कोठली नहीं भेजता थे परन्तु बहुओं के पीहर से कोथलियाँ आया करती थी  कोठली में सुहालियाँ पतासे प्रमुख होते थे इसके साथ ही सुन्दर सी जुले पर लगाने वाली सीधी और बहुओं और उनके बच्चो के कपड़े होते थे। 

जब मैं छोटी थी मेरी दादी इतनी सुहालियाँ बनाती थी कि वे महीनों तक खराएब नहीं होती थी और हम उन्हें महीना भर खूब चाव से खाया करते थे। सरसों का तेल गाँव के कोल्हू से ही बनवाया जाता था।  हमारी हवेली के आस -पास की मुसलमानों के घर थे।  मेरी दादी बताती थी कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बनते समय उन मुस्लिम घरों को हमारे परिवार ने अपने सरंक्षण में यहीं गाँव में रख लिया था।  एक परिवार तो हमारे बड़े दरवाजे के बिलकुल पास ही था उसका नाम सौदागर था वह रुई पिनान का काम करता था। उससे थोड़ा आगे चलकर लीलगरान का घर था वे कपड़ा और सूत रँगने का काम करते थे.उनके थोड़ा आगे चलकर कर-पांच परिवार थे जिनमें से अजमेर के पास कोल्हू था वह सरसों पीड़कर तेल निकालने का काम करता था एक विधवा महिला शबनम थी उसकी पांच बेटियां थी उसकी एक ब्याही हुई लड़कीजमालो अपने ससुराल के परिवार के साथ  पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थी. वह कई बार पकिस्तान से अपनी मां से मिलने हमारे गाँव अपने घर आया करतीय गाँव की सभी महिलाएं उसे मिलने और पाकिस्तान के बारे में जानने उसके घर जाया करती थी। 




आज तीज की बात हिंदुस्तान पाकिस्तान पर जाकर खत्म हुई हमारे देश का आजादी के बाद दो हिस्सों में बांटा  जाना सचमुच एक त्रासदी थी।      

xoxo

Monday, August 1, 2016

My Slide show

  i created this slide show in 2011



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xoxo

भारतीय झुग्गियों (Indian Slums) पर लिखी गई 3 कालजयी किताबें और उनका इतिहास

  
📚 
नमस्ते दोस्तों!
पिछले ब्लॉग में हमने देखा था कि कैसे 19वीं सदी के विक्टोरियन लंदन के स्लम को डिकेंस और आर्थर मॉरिसन ने अपनी किताबों में उतारा था। उस पोस्ट के बाद, कई पाठकों ने मुझसे पूछा कि "क्या आधुनिक भारत के स्लम पर भी ऐसी ही कोई प्रामाणिक किताबें लिखी गई हैं और वे कब प्रकाशित हुईं?"
आज का यह विशेष ब्लॉग उसी जिज्ञासा का जवाब है। मैंने भारत के झुग्गी-झोपड़ी जीवन, वहां के संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं पर लिखी गई 3 सबसे प्रसिद्ध किताबों और उनके प्रकाशन के इतिहास को खंगाला है। आइए इन्हें सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं:

1. "The City of Joy" (आनंद नगर) — वर्ष 1985
  • लेखक: डोमिनिक लापिएरे (Dominique Lapierre)
  • प्रकाशन वर्ष: यह उपन्यास मूल रूप से फ्रांसीसी भाषा में 1985 में प्रकाशित हुआ था और बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद आया।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह किताब 1970 और 1980 के दशक के शुरुआती दौर के कोलकाता (तब कलकत्ता) के एक स्लम 'आनंद नगर' पर आधारित है।
  • खास बात: यह भारतीय स्लम पर वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली शुरुआती किताबों में से एक है। इस पर 1992 में पैट्रिक स्वेजी स्टारर एक बेहद प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म भी बनी थी।
2. "Behind the Beautiful Forevers" (अन्नावाड़ी) — वर्ष 2012
  • लेखिका: कैथरीन बू (Katherine Boo)
  • प्रकाशन वर्ष: यह बहुप्रशंसित नॉन-फिक्शन किताब फरवरी 2012 में प्रकाशित हुई थी।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 2007 से 2011 के बीच के मुंबई (आधुनिक भारत के वैश्वीकरण के दौर) की कहानी है। लेखिका ने खुद मुंबई एयरपोर्ट के पास स्थित 'अन्नावाड़ी' स्लम में कई साल रहकर इस खोजी पत्रकारिता को किताब का रूप दिया।
  • खास बात: इस किताब ने 2012 में अमेरिका का प्रतिष्ठित 'National Book Award' जीता था। यह दिखाती है कि कैसे 21वीं सदी के चमकते भारत के साए में एक पूरी आबादी कचरा बीनकर गुजारा करने को मजबूर है।
3. "Chinnamani's World" (चिन्नामणी की दुनिया) — वर्ष 2011/2013
  • लेखक: मुकुंद राव (Mukunda Rao)
  • प्रकाशन वर्ष: बेंगलुरु के स्लम जीवन पर आधारित यह किताब 2011-2013 के आसपास सामने आई (अनुवाद और प्रकाशन के विभिन्न चरणों में)।
  • यह किस दौर की कहानी है?: यह 21वीं सदी के 'IT हब' कहे जाने वाले आधुनिक बेंगलुरु के स्लम और वहां 'स्लम क्लीयरेंस' (झुग्गी हटाओ अभियान) के दौर की कड़वी हकीकत बयां करती है।
  • खास बात: यह किताब सीधे तौर पर हमें आर्थर मॉरिसन की याद दिलाती है, जहाँ विकास के नाम पर गरीबों को उनकी बस्तियों से बेदखल कर दिया जाता है।

💡 निष्कर्ष: 1838 (लंदन) से 2012 (मुंबई) तक क्या बदला?
अगर हम टाइमलाइन को देखें:
  • चार्ल्स डिकेंस ने 1838 में लंदन का स्लम लिखा।
  • डोमिनिक लापिएरे ने 1985 में कोलकाता का स्लम लिखा।
  • कैथरीन बू ने 2012 में मुंबई का स्लम लिखा।
समय के इस विशाल अंतर के बावजूद, जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि चाहे 1838 का लंदन हो या 2012 का मुंबई—गरीबी, सरकारी तंत्र की उदासीनता, साफ पानी की किल्लत और स्लम के बच्चों का असमय खत्म होता बचपन... सब कुछ आज भी वैसा ही है।



Icreated this slide show in 2011
 My Slide show 


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xoxo