Sunday, October 31, 2010

हरा मखमल का पर्स... प्यारा! कितना!


इस पर्स का डिजाइन मेरा व्यक्तिगत है और इसे बनाया भी मैने स्वयं है.....
एक कपड़े की उम्र कितनी होती है या
कोई कपड़ा हमको इतना अच्छा लगता है कि
उसे हम अपने पास बनाये रखते हैं
देखिये इस हरे मखमल के पर्स को
इस कपड़े से मेरी मम्मी का सुट( सलवार कमीज़) बना था
बड़ा ही सुंदर सुट था मम्मी के पिता मेरे नाना ने
उन्हें यह मखमल का सुट १९५६ में सीलवा कर दिया था
गले, बाहों, और निचे ट्रिम पर जरदोजी का काम था
बहुत खुद्सुरत सुट लगता था मेरे जहन में याद करते ही उसकी तस्वीर जाती है.
१९६७ में जब में 9th में पढ़ती थी तब इस मम्मी के मखमल के

यह सभी फोटो अभी ली हैं अब इसके कोने घिस गये हैं
बार -बार निकालने और वापिस रखने के कारण
आब यह मेरे बेड के सिरहाने के बॉक्स में रहता है
इसमें आलतू फ़ालतू चीजें रखी रहती हैं
अभी में इसे और कितने दिन रखने वाली हूँ
भगवान् जाने
आप भी बनाइए इसे बड़ा आसान है
यह अपने आप खडा रह सकता है
इसे अन्दर से बेटे के पुराने रक्सिन के स्कूल बैग से बनाया गया है
अस्तर मेरे साडी से बने पुराने सुट का लगाया था, यानी सभी पुरानी चीजें इस्तेमाल की गईं थीं.
है ना "ग्रीन लिविंग" लाइफस्टाइल मेरी.





सुट से मैंने अपना सुट बना लिया था.
१९८६ में मैंने अपने इस हरे मखमल के सुट को काट कर यह पर्स बना लिया था
मैनें इसे खूब इस्तेमाल किया बड़ा ही सुन्दर लगता था
में इसे कोलेज ले जाती थी, बाज़ार भी ले जाती थी,
सिनेमा देखने जाते समय भी ले जाती थी.
पर्स सामने से


नीचे देखें पीछे कि साईड....
अन्दर झाँक कर देखें .......
अन्दर भी पुराना कपड़ा लगा है....इस फिरोजी रंग की ममी क़ी पुरानी साड़ी से मैने अपना सूट बनाया था ...बहुत खुबसूरत लगता था यह..... फ़िर इसकी मैने इस मखमल के पर्स मैं लाइनिंग लगा ली....
इस पर्स के अंदर लाइनिंग और मखमल के कपड़े के बीच मेनें बेटे के रेक्सीन के स्कूल बैग की वेडिंग लगाली इससे इस पर्स को बोडी मिली और यह स्वय बिना किसी सहारे के खड़ा रह सकता है....

देखिये पेड़ की टहनियों के बीच ..
इसकी फोटो खीचना और देखना मुझे बड़ा अच्छा लगता है।

रिसाइकिल कर चीजों को दोबारा इस्तेमाल कर हम अपनी सुखद यादें बरसों तक सहेज सकते हैं, और माँ धरती पर बेकार चीजें फैंक कर उस पर उनको गलाने का अनावश्यक बोझ भी हम काम करते हैं.....
और हम पर्स क़ी अपनी जरूरत के लिये नया कपड़ा यदि लेंगे तो कितने साधन अतिरिक्त लेने होंगे जो अनावश्यक बोझ डालेगा हमारी ज़ब पर....

आप भी चीजों को रिसाइकिल और रि यूज कीजिये ...

Here is another post for this purse only   ............http://kalewa.blogspot.in/2010/09/me-made.html


XOXO

Saturday, October 30, 2010

lunch box tote 3................जटरोपा का खुबसूरत फूल!


What a pretty strap for the carrier bag
W aah! I’m so impressed with the strap I've made for the lunch box carrier bag. A new name every time!







What a pretty and sturdy strap! I didn't realize it would be so…pretty! I mean, as nice as it is in the picture, it’s so much better in person. Lovely silver shinning details of the yarn, soooooooo soothing bright due to silver thread going through the yarn and beautiful. I may repeat sneaking this combo in my creations more often!


जटरोपा

प्रोजक्ट में काम के तहत गाव में बहुत बार जाना होता है,
कई बार ग्रामीण महिलाओं से सुना है कि हमारे पीहर में मेरे भाई ने जटरोपा की खेती की हुई है।
इससे बायो डीजल बनता है इसलिए खेतिहर किसान इसके ज्यादा दाम पाने कि गरज से इसकी खेती करते होंगे।
मैने जटरोपा के खेत कभी नहीं देखे।
एक पौधा जिसके यह सुन्दर फूल है ...इसकी खुबसूरत टहनियों की वजह से मैंने खरीदा था.
इसके सुन्दर फूल जिनमे कि कोई खुशबु नहीं है पर सुन्दर बहुत लगते है.







इस महीने में भी यह फूल खिले हैं
दोपहर में इन फूलों पर तितलियाँ बहुत आती हैं, जो कि बरामदे का माहोल संजीदा बना देती हैं.
इस पौधे को मैने गमले में लगा रखा है. इसे कई बार सजावट के लिये भोजन-कक्ष और कई बार ड्राइंग रूम में भी रख देती हूँ ...कमरे की खूबसूरती को यह पौधा चार- चाँद लगा देता है.
कभी न कभी मैं जटरोपा के खेत में इसकी खेती देखने जरुर जाउंगी ....कितने खुबसूरत लगते होंगे....
शब्बा खैर!

Thursday, October 28, 2010

सफेद श्रग बन कर तैयार हो गया!

क्रोशिये से सफेद धागे से बना यह श्रग मैं काफी दिनों से बना रही थी,
लगभग ४ इंच वर्ग के कई सारे टुकड़े और कुछ त्रिकोण बना कर, उन्हें जोड़ कर मैने इसे बनाया है.

बड़ा खुबसूरत बन गया है!



यह फोटो अच्छी नहीं निकली है!
देखिये टुकडियां जोड़ने के स्थान पर कोनो मैं स्वतः डिजाइन बन गया है....

सामने बंद करने के लिये डोरी बना कर गोल बटन (क्रोशिये के) बना कर लगिया दिए...
अगली किसी पोस्ट मैं इसे बनाने का पूरा तरीका लिखूंगी।
शब्बा खैर!

Sunday, October 24, 2010

देखिये यह जूट का कढाई कर बनाया कलैंडर जो मैंने वर्षो पहले बच्चों के लिए बनाया था
क्रोस स्टिच से कढ़ाई कर शब्द लिखा काज स्टिच कर तीन छेद निकाले उनके पीछे रिबनों पर महीने के दिन सप्ताह के दिन और तारीखों को लिखा और पीछे घुमाने के लिए लटका दिया ताकि उन्हें बदला जासके।
डंडिया कपड़े लपेटने वाली हैं जो की की दूकान से ली थी। गोटे से लटकन टांग दी गई .


ऊपर मोरों के पास देखिये दीपदान ...
नीचे देखिये मोर ...

और यह दो मोर आमने सामने
नीचे परियां गुब्बारे लिए हुए... बच्चों को लुभाने के लिए
नीचे तस्वीर देखिये ...यह कढाई मैंने वर्षों पहले कुशन क्वरों पर की थी ...
पुरानी
पड़ गई ही...

मैं इन बेल -बूटो , फूलों , परियों ,मोरों और दिए को फ़िर से कढाई कर सहेजूँग़ी .....
ताकि परम्परा का दिया हमेशा जलता रहे, रोशन रहे और परम्परा अगली पीढ़ी के लिये बनी रहे!
शब्बा खैर!

Saturday, October 23, 2010

बचे कपड़े भाग २......

कपडों के छोट -छोटे टुकडो के लिए मैंने चिपकने वाली बुकरम की ढेर सारी टुकडिया काट ली

ऊपर और नीचे के चित्रों में देखिये......
.....
एप्लिक की ये टुकडिया इन्हें कुशन, तकिये के कवर, चद्दर या मेजपोश की सुन्दरता बढाने के लिए लगाया जा सकता है ... फिलहाल ये सब डिब्बे में बंद है...फोटो खींचने के लिए इन्हें बाहर निकाला है .....
देखते हैं इनका उपयोग कब होगा और क्या होगा....


नीचे की चित्र में देखिये बहुत छोटी -छोटी टुकडियों से मैने यह रस्सियाँ बनाई
पहले एक प्लाई बना कर दो प्लाई को इकट्ठा कर के इन पर बल दे कर यह मजबूत रस्सियाँ बन गई..
क्लोज-अप देखिये


इस तरह समेटा मैंने अपनी सिलाई से बची कतरनों को
अब जल्दी से में इनका भी उपयोग करने वाली हूँ...
देखें कब होता है इसका मुहूर्त

Thursday, October 21, 2010

कतरनों का उपयोग

भाग १...
मैं ज़ब छठी कक्षा में थी तब से अपने कपड़े खुद सिलती हूँ।
पढाई कर ज़ब में सर्विस में आई तब मैं  अपने परिवार के बच्चों के डिजाइनदार कपड़े सिल कर मेग्जिन में छपने के लिए भेजने लगी....
बहरहाल बचे कपड़ों क़ी बात करें ...
मेरे पास सिलाई के बाद बचे कपड़ों के बैग-पर-बैग भर गये थे मेरी भांजी को मैंने पाला था और वह अपनी १२ व़ी  की कक्षा कर छुटियों पर थी ...मैंने उसे इन कपड़ों के ५-५ इंच के टुकड़े काट -काट कर दिए  एक रंग के दो टुकड़े इकट्ठे कर उनके बीच में १/४ इंच छोटा टुकड़ा पतले मलमल का लगाकर उन टुकड़ों को मोड़ कर ऊपर से कच्ची सिलाई करनी सिखाई ......सोचा  बाद में इनका कुछ बनायेंगे...क्या?
अभी तक भविष्य के गर्भ में ही है ...

भतीजी ने अपना काम बखूबी निभाया इससे उसकी एकाग्रता बढ़ने में भी सहायता मिली और शायद कुछ मनोरंजन भी हुआ.....यह लगभग ११-१२ वर्ष पहले की बात है....अब वह एम पी टी कर के एक फिजियोथेरेपिस्ट है

देखिये नीचे चित्र में आजकल इनकी फ़िर सुध ली गई है और यह इस अवस्था तक पहुंच गये हैं ...
मम्मी आजकल मेरे पास रह रही हैं ...बावजी के देहांत के बाद से ही वह मेरे पास हैं...
मम्मी ने इन टुकड़ों के चारों  तरफ काज-स्टिच कर दी है.
और मैं इनके चारों ओर क्रोसिये से ट्रेबल स्टिच से दो-दो चक्कर बुन रही हूँ...

ऊपर टुकड़े काज-स्टिच के साथ ओर कुछ क्रोसिये के साथ दिखाए गये हैं....
देखिये ऊपर .....अमेरिका से मेरी मामी द्वारा लाये गये खुबसूरत सूट के कपड़े का टुकड़ा ...
यह टुकड़े यदि फैंक दिए जाते तो इन्हें सड़ने में शायद वर्षो लगते ओर माँ धरती पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ता इन्हें सड़ाने का, वातावरण दूषित होता वह अलग...

कपड़ों के यह टुकड़े अपने साथ बहुत सी पुरानी यादें लिए हुए हैं.....

आगे इन तैयार टुकड़ों का क्या बनेगा देखेंगे....

शब्बाखैर!

Monday, October 18, 2010

गुडिया!

यह गुडिया मैने १९७९ में बनाई ....
इस गुडिया कि ड्रेस क्रोसिये से मेक्रेम तार से बनाई थी....
माफ़ करे इस पर धूल स्पष्ट दिखाई दे रही ही ...हिसार एरिड ज़ोन होने से ...और फ़िर हमारा घर ठीक चलते रास्ते पर होने के वजह से धूल का घर में निरंतर आना रहता है..

ड्रेस बना कर गुडिया को इसमें फिट कर दिया है ..
इस ड्रेस में यह श्याद चौथी गुडिया है ......

मैने गूगल में पाया कि इस के घेरे कि सतह को हाइपरबोलिक सर्फेस कहते हैं...
इसे पढिये जरा...

Hyperbolic Space
Crochet Models

In 1997 Cornell University mathematician Daina Taimina finally worked out how to make a physical model of hyperbolic space that allows us to feel, and to tactilely explore, the properties of this unique geometry. The method she used was crochet.


देखिये कम्प्यूटर पर
यहाँ फ्रिज पर
इसे कहिं रख लीजिये
अगले किसी पोस्ट में मैं ह्य्पेर्बोलिक स्पेस के बारे में बताना चाहूंगी....
क्या सयोग है....पर यह मेरा अपना डिज़ाइन है....
नमस्कार...

Sunday, October 17, 2010

सांझी (माँ देवी)
सांझी को माँ देवी के रूप में दशहरे से पहले पूजा ज़ाता है । हरियाणा में अक्सर क्वारी लडकियाँ माँ कि पूजा करती हैं। दीवार पर माँ की आकृती बनाने के लिए तालाब से गीली मिटटी लाकर उससे चाँद, तारे सूरज एवं माँ के चेहरे कि आकृतिया बना कर उन्हें सूखा लिया ज़ाता है।
फ़िर उन आकृतियों को दीवार पर गोबर कि सहायता से चिपकाकर माँ की पूरी आकृती बनाई जाती है...


देखिये नीचे माँ की आकृती को दीवार पर बनाया गया है....
माँ की आक्रती आसोज के शुक्ल पक्ष के अंत में लगाया ज़ाता है.

दशहरे के पहले तक रोजाना शाम को माँ की महिमा में गीत गाये जाते हैं...
दशहरे के दिन माँ की पूजा अर्चना की जाती है, फ़िर दीवार से सारी सामग्री कुचर कर उतार ली जाती है। मिटटी के एक कुल्हड़ में पेट पर चारों और छेद कर के उस में माँ का चेहरा डाल दिया ज़ाता है और उस कोल्हड़ में दिया जलाया जाता है।
सभी लडकियाँ माँ की महिमा में गीत गाती हुई अपने-अपने सीर पर कुल्हड़ उठाये हुए तालाब तक जाती हैं और कुल्हड़ तालाब में बहा देती हैं...
इसके बाद भी कुछ....

गावँ के लडके लट्ठ लेकर वहां पहुंचते हैं और कुल्हड़ों को तालाब के पार दूसरे छोर तक जाने से रोकते हैं, कुल्हड़ों को तालाब के पार तक ले जाना अशुभ माना जाता है.
इस तरह होती है हरियाणा में माँ की पूजा।
दशहरा मुबारक!
जय माँ!

Friday, October 1, 2010

Sniffles and snuffles

My creativity and Sniffles and snuffles ……

I got up early in the morning sharp 4:00. I did my heir combed for 5 minutes as usual, did my eye exerxises sitting on bench in park, in front of my house. But instead of doing all this and that. I think this morning, my head filled with sniffles and snuffles. My not feeling up to par’ has transformed itself into a full blown cold. Makes my head foggy.
So, for today, I am going to share a beautiful pic of my past creation.
With this. Iam going back to bed to give myself a cup of tea with biscuits and medicine thereafter. Because sometimes, all we can do is snuggle under the covers and know, “ this too shall pass”.