Tuesday, February 7, 2012

नफरत से मोहब्बत तक: मेरे नानाजी का घर, पापोसा गांव और 'पिंक लस्सी'(पिंक बटर मिल्क) की यादें




बचपन में मुझे अपनी मां के गांव 'पापोसा' से सख्त नफरत थी। सच कहूं तो वहां की झुलसाती गर्मी, अजीब स्वाद वाला पानी, सड़कों की गंदगी, बैलगाड़ियों का वो कछुआ चाल सिस्टम और खटारा बसें—मुझे वहां की हर एक चीज से चिढ़ थी। उबड़-खाबड़ रास्तों पर घंटों जाम में फंसे रहना किसी सजा जैसा लगता था।लेकिन मुझे नहीं पता था कि जिसे मैं बचपन में अपनी नासमझी में 'सजा' समझती थी , वो असल में यादों का सबसे कीमती खजाना था।

नाना जी की विरासत और वो जादुई दिन (करीब 65 साल पहले)लगभग 65 साल पहले, मेरे नाना जी  (मां के बाबूजी) ने ऑर्किड फार्म (बाग) के बीच एक खूबसूरत पुश्तैनी घर बनाया था। इस घर के चारों तरफ बादाम के पेड़, माल्टा,अमरुद,अनार,अंगूर,  गोबर गैस प्लांट, एक बड़ी डिग्गी (तालाब) और गुड़ बनाने का पारंपरिक कोल्हू था।गांव को लेकर मेरा नजरिया तब बदला, जब मां मुझे एक दिन खेतों की सैर पर ले गईं। हमने वहां बैठकर ताजे खरबूजे खाए, सुंदर बाग देखा,तीन बड़े -बड़े डॉग जो बाग़ की रखवाली करते थे, ज्ञानी नाम का माली, जो यू पी स्टेट से था, तांगे में भर-भर कर बाग़ और खेत के फल, सब्जियां पास के शहर हांसी की सब्जी मंडी में बेचने जाया करता, बहुत ही हंसमुख था.        मैंने पानी से लबालब बहती नदी के किनारे वक्त बिताया। तब जाकर मुझे नाना जी के बसाए इस स्वर्ग की असली खूबसूरती का अहसास हुआ।
नानू माईक मैं बोलते समय, साथ में हाथ पर पट्टी बांधे हुए बैठे है उनके पगड़ी बदल भाई, चौधरी सूरजमल उस समय के पंजाब के मंत्री( हरियाणा बनने से पहले का फोटो)



गर्मियों का वो गुलजार कुनबा जब तक नाना जी जीवित थे, यह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे पूरे बड़े परिवार का दिल था। नाना जी के बच्चे, उनके भाई का परिवार, दोनों भाइयों के पोते-पोतियां, बहनों और बुआ के बच्चे—सब गर्मियों की छुट्टियों में यहीं इकट्ठा होते थे।इसी आंगन में आज से ठीक 30 साल पहले, मेरी बेटी ने डगमगाते कदमों से अपनी जिंदगी के पहले कदम चलना यहीं पर सीखा था।हरियाणा की शान: मां के हाथ की 'पिंक लस्सी'इस पुश्तैनी घर और हरियाणा का जिक्र हो, तो वहां की पारंपरिक पिंक लस्सी के बिना कहानी अधूरी है, जिसके लिए कहावत है—"इतनी गाढ़ी चाहै चम्मच खड़ी कर दो "।मिट्टी के बर्तन (कढ़ावनी) में दूध को गुलाबी होने तक उबालना और फिर बिलौनी में रातभर जमाकर मथना... इस लंबे तरीके की वजह से लोग इसे रोज नहीं बनाते। लेकिन मेरी मां ने इसका एक ऐसा जादुई शॉर्टकट ढूंढा कि यह स्वाद सिर्फ 3 मिनट में तैयार हो जाता है! आज भी जब हमारे घर हरियाणवी दोस्त आते हैं, तो दोपहर के खाने में मां की यह '3-मिनट वंडर' लस्सी महफिल लूट लेती है।

पीढ़ियों का जुड़ाव: विक्की (मेरा बेटा) का पहला सफरवक्त का पहिया घूमा और पिछले वीकेंड विक्की पहली बार इस पुश्तैनी घर को देखने पहुंचा। उसने अपने परदादा को कभी देखा नहीं था, सिर्फ उनकी कहानियां सुनी थीं। अपने बच्चों को अपनी ननिहाल की जड़ों से दोबारा जुड़ते देखना और अपने बेटे को पहली बार इस पारिवारिक विरासत को महसूस करते देखना बेहद भावुक और खास पल है।अपनी जड़ों से यह जुड़ाव कितना जरूरी है, कितना खास है और दिल को कितना सुकून देता है, इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। 
xoxo 

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