बेटी की लिखी कविता जब पहली बार पर पढी जिसका शीर्षक है हब प्रेत की तरह आता था सिर दर्द तब मैं अपने सिर दर्द के लिए nostalgic हो गई और फिर सचमुच कल से सिर दर्द हो गया वजह....शायद यह थी की कल जब मैं पड़ौस का घर गई डाक्टर मल्होत्रा के लिए पूछे गए कमरे के रखरखाव को देखने गई तो मकान मालकिन ने उनके न रख सकने की मंशा जताई तब मुझे चिंता हुई और उसी के फलस्वरूप शायद मेरे सिर में भयंकर दर्द हो गया जो अभी तक वैसा ही बना हुआ है.. डाक्टर मल्होत्रा हिसार के चुडामनी अस्पताल में वर्षों तक डाक्टर रही है वे gynecologist aur surgeon हैं अब ९४ वर्ष की हो चुकी हैं मेरी वह अच्छी खासी दोस्त हैं और वह मेरे पास ही रहना चाहती थीं. परन्तु कोई ५-६ वर्ष पहले ..में जब किसी डाक्टर दम्पति का हस्पताल चलाने में मदद कर रही थी ..उन्ही दिनों वे एक मेज से टकरा गिर गई उनके कुल्हे की हड्डी क्रैक हो गई थी और उनकी बेटी उन्हें
भोपाल ले गई ...तब से वह वहीँ हैं ...परन्तु हर वर्ष उनका फोन आता रहा है की मैं आ रही हूँ परन्तु शायद उंकी बेटी उन्हें ज्यादा उम्र की होने की वजह से रोकती रही हैं ...परन्तु इस बार वे आ गई हैं ...इस समय वे दिल्ली में अपने भाई के यहाँ हैं ....बेटी विपिन चौधरी जब उनसे मिलने उनके भाई के घर गई तो उसने बताया की मम्मी मुझे उन्हें देख कर रोना आ गया वे बहुत कमजोर हो गई हैं...उनकी भतीजी ने बताया की मैं उनके कानों का इलाज करवा कर फिर तुम्हारे घर हिसार भेजूंगी...
कविता के आईने में जीवन का सच
मेरी बेटी विपिन चौधरी द्वारा लिखित यह कविता केवल एक शीर्षक नहीं है, बल्कि एक पूरी मुकम्मल दास्तान है. वह दर्द, जो कभी मेरी दादी समाकौर को था, फिर मुझ तक पहुँचा, और जिसे मेरे बच्चों ने अपनी नन्हीं हथेलियों से सहलाकर बाँटने की कोशिश की. इस कविता की ये पंक्तियाँ भीतर तक झकझोर देती हैं:
"कई सालो बाद मालूम हुआ
सिर का वह बदमाश दर्द कुछ और नहीं
पिता से माँ के अनसुलझे-बेमेल रिश्ते की पैनी गाँठ थी..."
एक साहित्यकार की दृष्टि और एक बेटी का संवेदनशील मन ही यह देख सकता है कि शरीर का रोग कहाँ जाकर आत्मा और रिश्तों के तनाव से जुड़ जाता है. वह बेमेल रिश्तों की पैनी गाँठ, जो वक्त के साथ खुली तो दर्द भी कहीं दूर चला गया. लेकिन यादें तो बनी रहती हैं.
एक आत्मीय संकोच और प्रतीक्षा
जब कोई अजनबी हमारी ऐसी गहरी और निजी पोस्ट को पढ़ता है, तो एक अजीब सी सिहरन या दहशत होना स्वाभाविक है. लेकिन सच यह है कि जो दर्द और जो आत्मीयता इस पूरे वाकये में है, वह सार्वभौमिक है. डॉ. मल्होत्रा की कमज़ोरी की खबर सुनकर बेटी की आँखों में आए आँसू और भतीजी द्वारा उनके कानों का इलाज करवाकर उन्हें वापस हिसार हमारे पास भेजने का भरोसा—यह दिखाता है कि इस दुनिया में तमाम मुश्किलों के बाद भी फिक्र, मोहब्बत और इंसानी रिश्ते ज़िंदा हैं.
अब मुझे इंतजार है कब उनके कानों का इलाज हो और मैं उन्हें अपने घर हिसार लेकर आऊँ. जैसे ही उनके कानों का इलाज पूरा हो और वे मेरे पास हिसार आएँ, तो पुरानी यादों का वह आंगन फिर से चहक उठेगा. यह न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए बल्कि मेरे मन की उस पुरानी चिंता और सिर-दर्द को भी हमेशा के लिए शांत कर देगा.
बेटी की इन्ही दिनों एक कहानी लमही में छपी है लमही जो की उर्दूऔर हिंदी के मशहूर साहित्यकार
मुंशी प्रेम चंद के पोते द्वारा निकाली जा रही है...इस पुस्तिका का विमोचन राजेन्द्र यादव ने किया है जो
हंस पत्रिका निकालते हैं
जब देखें इस लिंक पर चटका करभी देखे
मेरा आज का inspiration a creative cat: July 2010
XOXO
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