Sunday, May 27, 2012

चिरमिरी: बचपन के लाल मोती और एक भूली-बिसरी याद


कल अचानक मेरी आँख में कोई बारीक-सी चीज़ चली गई। लाख कोशिशों के बाद भी वह बाहर नहीं निकली। मम्मी ने हमेशा की तरह घरेलू नुस्खा बताया—"दूसरी आँख को धीरे-धीरे मलो, शायद तिनका या बाल अपने आप निकल जाए।"

काफी मशक्कत के बाद वह कण तो निकल गया, लेकिन आँख में दर्द देर तक बना रहा। उसी क्षण जाने कहाँ से बचपन की एक धुँधली-सी स्मृति मन में उतर आई।

मुझे अपनी दादी याद आ गईं।

दादी के पास एक छोटी-सी डिबिया रहती थी, जिसमें लाल-लाल, चमकीले और बेहद चिकने बीज रखे होते थे। उनके एक सिरे पर काला निशान होता था। हमारे यहाँ इन्हें "चिरमिरी" कहा जाता था।

बचपन में मैं उन्हें सचमुच मोती समझती थी। उन लाल चमकते दानों को देखकर मन ललचा जाता था। मोतियों से मेरा बचपन का प्रेम अलग ही था, उसकी कहानी फिर कभी।

यह फोटो विकी से ली है

फिलहाल लौटते हैं चिरमिरी पर।

बरसों बाद अचानक यह नाम याद आया तो मन में जिज्ञासा जागी। फिर शुरू हुई खोज—आज की भाषा में कहें तो "गूगलिंग"।

तब पता चला कि चिरमिरी का वानस्पतिक नाम Abrus precatorius है। अंग्रेज़ी में इसे Rosary Pea या Jequirity Bean भी कहा जाता है।

मम्मी ने बताया कि यह बेल हमारे गाँव के टिब्बों वाले खेतों में बहुत हुआ करती थी। समय बदला, खेत बदल गए, परिस्थितियाँ बदल गईं और शायद यह पौधा भी हमारी आँखों से ओझल हो गया।

इंटरनेट पर जानकारी खोजते समय यह भी पता चला कि इसके बीज अत्यंत विषैले होते हैं। इसलिए इन्हें केवल सजावटी वस्तु या अध्ययन के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इनके साथ सावधानी बरतना आवश्यक है।

 

Source:internet

यह फोटो यहाँ से ली हैं 






 

यह पढ़कर मुझे मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी का प्रसंग भी याद आया, जिसमें इस पौधे के विषैले गुणों का उल्लेख मिलता है। लेकिन किसी भी प्राकृतिक वस्तु का मूल्य उसके दुरुपयोग से नहीं, बल्कि उसके सही ज्ञान और विवेकपूर्ण उपयोग से आँका जाना चाहिए।

आज सोचती हूँ कि हमारे गाँवों की कितनी ही ऐसी वनस्पतियाँ, लोकनाम और उनसे जुड़ी स्मृतियाँ धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। नई पीढ़ी शायद "चिरमिरी" का नाम भी न जानती हो।

मेरे लिए चिरमिरी केवल एक बीज नहीं है। वह मेरे बचपन की चमक है, दादी की डिबिया है, गाँव की मिट्टी की खुशबू है और उन दिनों की याद है जब छोटी-छोटी चीज़ें भी अनमोल लगती थीं।

क्या आपके बचपन में भी किसी पौधे, बीज या ऐसी किसी छोटी-सी वस्तु से जुड़ी कोई प्यारी स्मृति है? यदि हाँ, तो उसे टिप्पणी में अवश्य साझा कीजिए। ऐसी यादें ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती हैं।

शब्बा खैर!!!!!!!





















 







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