हरियाणा केवल अपनी खेती, दूध-दही और मजबूत ग्रामीण जीवन-परंपराओं के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहाँ की लोक-संस्कृति में स्त्रियों की पारंपरिक वेशभूषा, कढ़ाई, बुनाई और आभूषणों का भी अपना विशेष स्थान रहा है।
आज आधुनिक परिधान हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन कुछ दशक पहले तक हरियाणा के गाँवों में स्त्रियों की पहचान उनके पारंपरिक वस्त्रों और आभूषणों से भी होती थी। ये वस्त्र केवल पहनने की चीजें नहीं थे; इनमें स्थानीय कारीगरी, श्रम, सौंदर्य-बोध और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएँ समाई हुई थीं।
मेरी यह पोस्ट हरियाणा की ऐसी ही कुछ पारंपरिक वस्तु
दामण — हरियाणवी स्त्री की पारंपरिक पहचान
दामण (Daaman) हरियाणा की ग्रामीण महिलाओं की पारंपरिक पोशाक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसे बोलचाल में घाघरी भी कहा जाता था।
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a traditional dress colloquially named as Daaman or ('Ghaaghri' ..i.e. A very heavy, bulky and beautiful skirt worn by womenfolk in villages |
दामण केवल पहनावा नहीं था। उसके रंग, कपड़े, कढ़ाई और घेर में ग्रामीण स्त्री की सुंदरता और उसके परिवार की आर्थिक-सामाजिक स्थिति की झलक भी दिखाई देती थी।
डबोट्टा — दामण का ऊपरी हिस्सा
दामण के ऊपरी भाग को डबोट्टा (Dabotta) कहा जाता था। इसी हिस्से में मोटी सूती डोरी, जिसे नाड़ा (Naadda) कहा जाता था, डाली जाती थी। नाड़े की सहायता से दामण को कमर पर बाँधा जाता था।
यह साधारण-सी व्यवस्था उस समय के ग्रामीण जीवन की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को भी दर्शाती है—ऐसे वस्त्र जो सुंदर होने के साथ-साथ रोजमर्रा के श्रम और जीवन के अनुकूल भी हों।
लामण — दामण का निचला भाग
दामण के निचले हिस्से को लामण (Laaman) कहा जाता था।
दामण की सुंदरता में उसके घेर और निचले भाग का विशेष योगदान होता था। चलते समय इसका लहराता हुआ घेर ग्रामीण स्त्री की पारंपरिक पोशाक को एक विशिष्ट पहचान देता था।
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| डेवटी से बना घाघरा |
चूंदड़ी — सिर और ओढ़नी की शोभा
चूंदड़ी (Chund-di) को हिंदी की चुन्नी के समान माना जा सकता है।
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चूंदड़ी |
चूंदड़ी के रंग और डिजाइन पूरे पहनावे को एक अलग आकर्षण देते थे। विशेष अवसरों पर सुंदर और रंगीन ओढ़नियाँ पहनना ग्रामीण स्त्रियों के श्रृंगार का हिस्सा हुआ करता था।
आंगी — दामण के साथ पहना जाने वाला परिधान
आंगी (Aangi) दामण के साथ पहना जाने वाला पारंपरिक ब्लाउज था।
आज हम जिस तरह ब्लाउज को साड़ी या अन्य परिधानों के साथ जोड़कर देखते हैं, उसी तरह आंगी पारंपरिक हरियाणवी दामण के पहनावे का महत्वपूर्ण अंग थी।
दामण, आंगी और चूंदड़ी मिलकर हरियाणवी स्त्री की पारंपरिक पोशाक को पूरा करते थे।
इन तीनों को एक साथ देखने पर समझ में आता है कि ग्रामीण स्त्री का पहनावा केवल अलग-अलग कपड़ों का मेल नहीं था, बल्कि एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परिधान था।
टोपा — बच्चों की पारंपरिक पोशाक का हिस्सा
टोपा (Topaa) बच्चों के लिए बनाई जाने वाली एक सुंदर पारंपरिक टोपी थी, जिसे कढ़ाई और पैचवर्क से सजाया जाता था। इसमें हूड जैसा हिस्सा भी होता था।
बच्चों के वस्त्रों में भी रंग, कढ़ाई और सजावट को महत्व दिया जाता था। टोपा इसका सुंदर उदाहरण है।
इस तरह की छोटी-छोटी वस्तुएँ हमें यह बताती हैं कि लोक-संस्कृति केवल वयस्कों के पहनावे तक सीमित नहीं थी; वह बच्चों के जीवन में भी उतनी ही सहजता से उपस्थित थी।
पारंपरिक आभूषण और गहनों की पेटी
हरियाणवी स्त्री का पारंपरिक श्रृंगार उसके वस्त्रों के साथ उसके आभूषणों से भी पूरा होता था।
पुरानी तस्वीरों में दिखाई देने वाली पारंपरिक ज्वेलरी बॉक्स जैसी वस्तुएँ भी इस संस्कृति का हिस्सा थीं। इनमें स्त्रियाँ अपने कीमती और प्रिय आभूषण सँभालकर रखती थीं।
पारंपरिक आभूषण केवल सौंदर्य बढ़ाने के लिए नहीं पहने जाते थे। विवाह, त्योहार, पारिवारिक समारोह और विशेष अवसरों पर इनका अपना सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता था।
जब कोई हरियाणवी महिला अपने पारंपरिक वस्त्रों के साथ पूरे आभूषण पहनती थी, तो उसका रूप ग्रामीण हरियाणा की समृद्ध लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन जाता था।
| A Haryanvi woman with all traditional jewelry with Chunda
Choonda ...i..e...A hair style of rural womenfolk -
to tie the hair with strings on top of the head
चूंडापारंपरिक श्रृंगार में चूंडा भी विशेष महत्व रखता था। मेरी मूल सामग्री में Choonda का उल्लेख ग्रामीण महिलाओं की बाल-सज्जा के संदर्भ में है—बालों को ऊपर की ओर बाँधकर उन्हें डोरियों आदि से सजाने की पारंपरिक शैली। बालों की ऐसी सज्जा भी उस समय की ग्रामीण स्त्री के दैनिक जीवन का हिस्सा थी। आज की तरह हेयरस्टाइल बदलने के लिए अनेक साधन उपलब्ध नहीं थे, फिर भी महिलाएँ अपने बालों को बहुत सुंदर और सलीके से सँवारती थीं। वस्त्रों से कहीं अधिक है यह विरासतइन सभी वस्तुओं को एक साथ देखने पर एक बात बहुत स्पष्ट होती है—हरियाणा की पारंपरिक वेशभूषा केवल कपड़े और आभूषणों का संग्रह नहीं थी। इसके पीछे कपास उगाने वाले किसान, सूत तैयार करने वाली महिलाएँ, कपड़ा बुनने वाले कारीगर, कपड़ों पर कढ़ाई करने वाली स्त्रियाँ और उन्हें पहनने वाली पीढ़ियाँ—सबकी मेहनत जुड़ी हुई थी। एक दामण के पीछे केवल कपड़ा नहीं था; उसमें बुनाई, सिलाई और स्त्री-श्रम की कहानी थी। एक फुलकारी में केवल रंगीन धागे नहीं थे; उसमें किसी महिला के धैर्य, कल्पना और सृजनशीलता की कहानी थी। एक चूंदड़ी में केवल रंग नहीं थे; उसमें सामाजिक परंपराएँ और जीवन के संस्कार जुड़े थे। और पारंपरिक आभूषणों में केवल चमक नहीं थी; उनमें परिवार, विवाह और पीढ़ियों से चली आती स्मृतियाँ सुरक्षित रहती थीं। बदलते समय में बची हुई स्मृतियाँसमय के साथ पहनावे में बहुत बदलाव आया है। दामण और आंगी जैसे पारंपरिक परिधान अब रोजमर्रा के जीवन में पहले की तरह दिखाई नहीं देते। आधुनिक कपड़ों ने उनकी जगह ले ली है। फिर भी इन वस्तुओं को देखकर हमें अपने अतीत की एक पूरी दुनिया दिखाई देती है—वह दुनिया जहाँ घर, खेत, आँगन, श्रम, उत्सव, कढ़ाई, बुनाई और स्त्री-सृजनशीलता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। आज आवश्यकता केवल इन वस्तुओं को संग्रहालयों में सुरक्षित रखने की नहीं, बल्कि इनके पीछे छिपी कहानियों, शब्दावली और सांस्कृतिक अर्थों को भी अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की है। मेरे लिए इन पारंपरिक वस्तुओं को देखना केवल पुरानी चीजों को देखना नहीं है। यह अपने प्रदेश की उस लोक-स्मृति से जुड़ना है, जिसने हमारी संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँजोकर रखा। हरियाणा की यह विरासत हमारे अतीत की पहचान ही नहीं, हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक जीवंत हिस्सा है। इसे याद रखना और आगे पहुँचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
xoxo
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