जेठ का महीना, नवतपा और घाघ-भड्डरी का पारंपरिक मौसम-ज्ञान
अब जेठ का महीना शुरू हो चुका है। 25 मई को सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के साथ ही नवतपा का आरंभ हो गया है, जो 3 जून तक रहेगा। इसके बाद 15 जून को निर्जला एकादशी है। ऐसे समय में अक्सर यह उत्सुकता रहती है कि वर्षा कब होगी और खरीफ की बुआई कब शुरू की जाएगी।
वर्षा का अनुमान लगाने के संबंध में कवि घाघ और भड्डरी का लोक-अनुभव अद्भुत रहा है। उनका प्रकृति-निरीक्षण इतना सूक्ष्म था कि वे गौरैया, गिरगिट, बकरी, सांप, मेंढक, चींटियों, आकाश के रंग, बादलों की चाल और हवा की दिशा देखकर मौसम का सटीक अनुमान लगा लेते थे।
सबसे विलक्षण बात यह है कि पौष और माघ महीने के वातावरण को देखकर सावन और भाद्रपद (भादो) की वर्षा का अनुमान लगाया जाता था—एक ऐसा पारंपरिक विज्ञान जो आधुनिक तकनीकों के पास भी नहीं है:
- वर्षा का गर्भाधान: पौष और माघ के महीने वर्षा के 'गर्भधारण' का समय माने जाते हैं। इस दौरान हवा का घुमाव, बिजली की चमक और बादलों की स्थिति देखकर सावन-भादो की बारिश का आकलन होता है। माना जाता है कि वर्षा का गर्भ लगभग 196 दिनों में पकता है।
- गर्भस्राव: ज्येष्ठ (जेठ) का महीना वर्षा के 'गर्भस्राव' का समय है। यदि जेठ का महीना बिना बरसे तपता हुआ बीत जाए, तो माना जाता है कि सावन और भादों में भरपूर वर्षा होगी।
- नक्षत्र चक्र और हस्त नक्षत्र: ज्योतिष में 12 राशियां और 27 नक्षत्र माने गए हैं। सामान्यतः सूर्य हर 14 दिन में नक्षत्र बदलता है, परंतु हस्त नक्षत्र इसका अपवाद है—यह 16 दिनों का माना जाता है। हस्त नक्षत्र को चार भागों (सोना, चांदी, तांबा और लोहा) में बांटा जाता है। मान्यता है कि जिस भाग में वर्षा होती है, उसी धातु के मूल्य के अनुसार कृषि पैदावार और समृद्धि तय होती है।
परिश्रम से बदली तकदीर: टीबों की मिट्टी बदलकर सोना उपजाते किसान
जब भी जेठ और वर्षा की बात आती है, तो मुझे अपने टीबे वाले खेत की याद आ जाती है। प्रकृति के साथ-साथ किसानों की अपनी मेहनत भी बंजर धरती को सुजलाम-सुफलाम बना देती है।
हरियाणा के फतेहाबाद जिले के गांवों से आई एक खबर इसका बेहतरीन उदाहरण है। जहां कभी रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले थे और सिंचाई का कोई साधन नहीं था, वहां के किसानों ने अद्भुत सूझ-बूझ दिखाई:
- मिट्टी की अदला-बदली (Soil Transfer): बाढ़ संभावित इलाकों (रतिया और जाखल) की बहुत ज्यादा सख्त और चिकनी मिट्टी को ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से टीबों वाली रेतीली जमीन पर डाला गया। वहीं, चिकनी जमीन में रेत मिलाकर उसकी निथार क्षमता सुधारी गई।
- स्वावलंबन: बिना किसी सरकारी सहायता के, किसानों ने अपनी जेब से खर्च करके और खुद मेहनत करके बंजर टीबों को समतल किया।
- परिणाम: परिणाम यह हुआ कि पिछले एक दशक में लगभग 10,000 हेक्टेयर बंजर भूमि उपजाऊ बन गई और आज वहां धान व अन्य फसलों की लहलहाती पैदावार हो रही है।
सामाजिक और आर्थिक प्रगति: श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी
प्रकृति की अनुकूलता और किसानों के कठोर परिश्रम के साथ-साथ समाज की प्रगति तब पूरी होती है जब उसमें महिलाओं की बराबर की भागीदारी हो।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक रिपोर्ट—"विमेन इन बिजनेस एंड मैनेजमेंट: द बिजनेस केस फॉर चेंज"—इसी बात की पुष्टि करती है:
- 30% की सीमा (Critical Mass): रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी संस्थान या व्यवसाय में लैंगिक विविधता का लाभ उठाने के लिए कम से कम 30% महिलाओं की भागीदारी आवश्यक है।
- मुनाफे और उत्पादकता में वृद्धि: जिन संस्थानों में समावेशी संस्कृति है, वहां लाभ और उत्पादकता बढ़ने की संभावना 60% से अधिक पाई गई।
- आर्थिक लाभ: यदि श्रम बाजार में लैंगिक अंतर को 25% तक कम कर दिया जाए, तो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में खरबों डॉलर का इजाफा हो सकता है।
चाहे घाघ-भड्डरी का पारंपरिक ज्ञान हो, फतेहाबाद के किसानों का अपनी माटी बदलने का जिजीविषा भरा प्रयास हो, या फिर अर्थव्यवस्था में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की बात हो—यह सब दिखाता है कि जब परंपरा, मेहनत और समावेशी सोच एक साथ आते हैं, तभी वास्तविक समृद्धि आती है।
चाहे आकाश को देखकर मौसम का अनुमान लगाने की हमारी पारंपरिक धरोहर हो, बंजर टीबों को अपनी मेहनत से सोना बना देने वाले किसानों का जज़्बा हो, या फिर समाज की प्रगति में महिलाओं की बराबरी की भागीदारी—ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि जब अनुभव, परिश्रम और समावेशी सोच एक साथ आते हैं, तभी सच्चा विकास संभव होता है।
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