Have nothing in your house that you do not know to be useful, or believe to be beautiful. - William Morris
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Friday, September 30, 2022
हरियाणवी कविता ....
डाभ /कुश / काँस (An evergreen wild weed which has deep roots going down to water level)
हमारे खेत में इतनी थी की जितनी काटो उतनी और उपज आती थी....अब उस टिब्बे को सीधा कर दिया था पर डाभ अब भी बहुतायत में है....
प्रस्तुत है॥
हरियाणवी कविता ....
डाभ /कुश / काँस (An evergreen wild weed which has deep roots going down to water level)
हमारे खेत में इतनी थी की जितनी काटो उतनी और उपज आती थी....अब उस टिब्बे को सीधा कर दिया था पर डाभ अब भी बहुतायत में है....
प्रस्तुत है॥कविता:
डाभ कै म्हारे खेत मैं
मूँग, मोठ लहरावे रे
काचर, सिरटे और मतीरे
धापली कै मन भावै रे
रे देखो टिब्बे तलै कुयकर झूमी बाजरी रे।
बरसे सामण अर भादों
मुल्की बालू रेत रे,
बणठण चाली तीज मनावण
टिब्बे भाजी लाल तीज रे
रे देखो पींग चढ़ावै बिंदणी रे।
होली आई धूम मचान्दी
गूँजें फाग धमाल रे,
भे – भे कीं मारे कोरड़े
देवर करे बेहाल रे,
रे देखो होली में नाच रही क्यूकर गोरी बेलहाज रे।
जोहड़ी में बोले तोते
बागां बोलै मोर रे,
पनघट चाली बिंदणी
कर सोलह सिंणगार रे,
रे देखो पणघट पर बाज रही है रमझोल रे।
खावंद कई आवण की बेल्या
चिड़ी नहावै रेत रे,
आज बटेऊ आवैगा
संदेश देव काग रे
रे देखो डोली पर बोल रहया कागला रे
डाभ कै म्हारे खेत मैं
मूँग, मोठ लहरावे रे
happy writting!!!
XOXO
Tuesday, May 11, 2021
Ker ka Ped | केर का पेड़ |
जब मैं छोटी थी ,हमारे बारानी इलाके(arid area) में केर के पेड़ बहुत होते थे, उन पर टिंट बहुत लगते थे, जांडी (खेजड़ी,A thorny tree found in arid zones – it has tiny leaves which can be eaten by camels and goats. ), जाल(A wild, thick tree which does not have thorns. Its fruit is like a tiny berry, called 'peehl' पील) और केर वो 3 पेड़ ऐसे थे जो गर्मियों में आबाद रहते थे. ये तीनों पेड़ मई-जून के तपते दिनों में हमारे बारानी इलाके को आबाद रखते थे। मेरी पर दादी बताया करती थी,जब छपनिया अकाल पड़ा था तब लोगों ने खेजड़ी की छाल पीसकर रोटियां बनाकर खाई थीं। हमारे खेत में और गांव भर में ढेरों जांडी के पेड़ होते थे ,जिन्हें अक्टूबर में छांग(prunning ) कर उनके पत्तों को झाड़ लिया जाता था जिसे लूंगा कहते हैं वह पशुओं खासकर ऊंटों का पसंदीदा चारा होता है, लकड़ियों को सूखा कर उनका मरीड़ा बना लिया करते थे और साल भर उन लकड़ियों को ईंधन के रूप में जलाया करते थे. जांदी पर सांगरी लगती है जिसकी सब्जी बहुत स्वादिष्ट होती है इसे सांगरी को सूखा कर इसकी वर्ष भर सब्जी बनाई जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है. सांगरी पाक कर खोखा हो जाती है वह इसका फल होता है जो बहुत स्वादिष्ट होता है। केर और जाल के झाड़ बणी में खूब होते थे जिन पर पील और पिंजू लगते थे. केर ( wild tree,its raw fruit called 'Qair' कैर,टींट - this fruit is also called 'Peechu' पिंजू when ripe. ) का हरा फल टींट कहलाता है उसकी सब्जी और अचार बनता है,पक कर इसका फल लाल हो जाता है इसे पिंजू कहते हैं यह बहुत स्वादिष्ट होता है। सांगरी कहते हैं। अब बारानी इलाकों (arid areas) में जांडी के पेडों की संख्या लगातार कम हो रही है। वे जांडी के ही पेड़ थे जिन्हें बचाने के लिए अमृता बाई ने बलिदान दिया था। 1730 ई. के उस दिन जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में विश्नोई समाज के 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों से लिपटकर अपनी जान दे दी थी।
xoxo.
Monday, July 1, 2013
great ideas
The Gallery: Outside my front door
I am so lucky because just outside my front door there is a world of
fields, gnarled trees, hedgerows and wild flowers and all just a short journey
away.
OK, so they’re not exactly outside my front door, but these places are
where we as a family spend a lot of our holiday time. These are around the two
villages my Nnanu’s (paternal grandfather)village Paposa and my Dadu’s(paternal
grandfather) village.
They are our sanctuaries. They are places the children can run and climb
and throw sticks and discover the flora and fauna and develop a love of nature.
xoxo
Saturday, October 13, 2012
बेरी के झाड़
पार्क में यह पेड़ (झाड़) देख्
बचपन के वो दिन, ना जाने कैसे, मुझे आज याद आ गए? उन दिनों हम अपने गाँव खरकड़ी माखवान में रह रहे थे. समणी काटने के बाद खेत उजाड़ हो चले थे मैं कोई 10-11 वर्ष की रही होंगी फिर स्कूल से छुट्टी होंने पर हम पास के टिब्बों के खेतों में निकाल जाते और डोलों पर लगी ढेरों झाड़ बेरियों पर से छोटे-छोटे बेर तोड़ कर लाते और उन्हें मिटटी की कोरी कुल्हडियों (टेरा-कोटा के बर्तन ) में भर कर रख लेते थे।उन लाला-लाल खट्टे-मीठे बेरों को गोलिये बेर कहते थे वे बड़े स्वादिष्ट होते थे. बालू रेत के टिब्बे घर के इतनी पास भी नहीं थे ! पर टिब्बे ओर छोटी-छोटी पहाड़ीयों पर उगे बेरी के झाड़ मानो हमें बुलाते थे !
| Kharkari-Makhwan |
उन पर लगी लाल पीली बेरियां हमें सपने में भी मानो आवाज़ लगातीं ! रास्ते भर हम तरह तरह की बातें करते रहते ! “बेरी खाने से दिमाग़ तेज़ हो जाता है ! मेरे दादा ने कहा है कि अगर बेरी खाओगे तो पढ़ाई में तुम्हारे खूब अच्छे नंबर आयेंगे !” गोया बेरी ना हो गई अमर फल हो गई ! पर सच्ची बात तो ये थी कि बिना पैसे के ये फल अमर फल से कम नहीं थे ! ना कोई डाँटने वाला, ना कोई भगाने वाला ! बेरी तोड़ते तोड़ते कितने ही काँटे पैरों में घुस जाते ! कितने ही हाथों को बींध देते ! पर हाय रे बेरी का लालच !
वो कतई कम नहीं होता ! अब कहाँ वह् बेरियाँ अयार फिर इन्हें कैट कर बाद बना ली जाती ओर होली के दिनों में बच्चे यह बेरी के ढिक्खर फाड़-फाड़ कर गांव के फलसे में बड़ी सारी होली बना देते अब कहाँ बाद! ओर कहाँ ढिक्खर???????
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