Saturday, March 23, 2019

भाग्यवाद से दूर, स्वावलंबन की राह: रमणिका गुप्ता के साथ ग्यारह साल

उनके लिए लिखे आलेख को क्या कहूं 

जीवन को जीवन की तरह जिया, किसी मरीचिका की तरह नहीं।" रामणिका गुप्ता जी के स्वावलंबी जीवन, अदम्य ऊर्जा और बेबाक साफ़गोई को याद करते हुए एक विशेष आलेख।

या

"मेरा घर एक कम्यून है।" दक्षिण दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी वाले घर की यादों से लेकर कोयला खदान आंदोलनों तक—रमणिका जी के जीवंत और बेबाक व्यक्तित्व की कुछ अनछुई परतें।

या

एक ऐसी ऊर्जा जो अंत तक अपने होने का उत्सव मनाती रही। आदिवासी साहित्य और आंदोलनों की सशक्त हस्ताक्षर रमणिका गुप्ता जी को समर्पित संस्मरण।

किसी भी चर्चित व्यक्ति, ख़ास तौर पर एक चर्चित स्त्री का जीवन एकरेखीय नहीं होता। उनका भी नहीं था

रमणिका गुप्ता मेरे लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का नाम हैं। ऐसी ऊर्जा जो अंत तक अपने होने का भरपूर उत्सव मनाती है। इस बात को सिरे से नज़रअंदाज़ करते हुए कि कोई दूसरा उनके उस उत्सव में शामिल है या नहीं। उनके यहाँ भाग्यवाद को एक तिनके भर की जगह भी नहीं थी। जीवन के विद्यार्थी के रूप में उनके क़रीब रहकर मैंने जो चीज़ें सीखीं, उनमें सकारात्मकता का साथ देना और भाग्यवाद से दूरी बनाए रखना सबसे पहली और अहम सीख थी। उनके साथ से ही यह भी समझा कि यदि आपको किसी के जीवन से प्रेरणा ग्रहण करनी हो, तो अपनी प्रत्यक्ष सूझ-बूझ पर ही भरोसा करना चाहिए, सुनी-सुनाई कहानियों पर नहीं

आदिवासी साहित्य में रमणिका गुप्ता का योगदान अद्वितीय है

जेएनयू में आयोजित 'आदिवासी प्रतिभा की खोज' सेमिनार के मंच पर रमणिका गुप्ता जी साहित्यकारों एवं सहयोगियों के साथ


अपने लंबे जीवन में उन्होंने कभी हार नहीं मानी। जीवन को जीवन की तरह जिया, किसी मरीचिका या सपने की तरह नहीं। बरसों तक देर रात काम करने के बाद, सुबह नहा-धोकर वे पूरे ठसक के साथ अपनी घड़ी का फीता बाँधती थीं। उन्हें देखकर लगता था कि आज भी उन्हें किसी मिशन पर ठीक उसी तरह निकलना है, जैसे वे अपने ट्रेड यूनियन या विधायकी के दिनों में निकलती थीं

सीखने और ग्रहण करने का जज़्बा रखने वाले लोग रमणिका जी की सक्रियता से बहुत कुछ सीख सकते थे; जो ऐसा नहीं कर पाते थे, उनके हाथ केवल नकारात्मकता ही लगती थी। उनकी बेहद सक्रिय जीवनचर्या को देखकर यह समझना मुश्किल नहीं था कि एक स्वावलंबी जीवन आराम की मांग नहीं करता, बल्कि जीवन की रीढ़ सीधी रखने के लिए बहुत कठिन अभ्यास माँगता है। एक संपादिका, लेखिका और राजनेत्री के रूप में उनके विस्तृत कार्यक्षेत्र और सक्रियता से मैंने बहुत कुछ सीखा


डिफेंस कॉलोनी स्थित आवास पर देश-विदेश से आए प्रबुद्धजनों व मित्रों के बीच रमणिका जी (केंद्र में)

चाहे लेखक संगठनों के आपसी मतभेद हों या फिर राजनीति की उठपटक—हर मुद्दे पर उनकी अपनी स्पष्ट राय होती थी। यह उनके व्यक्तित्व की साफ़गोई ही थी कि उन्होंने रिश्तों के पाखंड में कभी विश्वास नहीं किया। जब तक किसी रिश्ते में रहीं, उसे पूरी आत्मीयता से जिया और उसकी ऊष्मा ख़त्म होने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा

कई बार उनके विचारों से असहमति के बावजूद कभी मन में खटास नहीं आई। यहाँ तक कि आवेश में कहे गए मेरे वाक्यों का भी उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। उनसे लगभग ग्यारह साल का परिचय था, मगर लगता है जैसे सदियों से उनका साथ रहा हो। अपनी राजनीतिक सक्रियता से जुड़ी बातें सुनाते समय उनकी आँखों में एक ख़ास चमक दिखाई देती थी। बरसों पहले कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर आज भी उन्हें शिद्दत से याद करते हुए फोन किया करते थे। तब रमणिका जी बताती थीं कि यह अमुक व्यक्ति हमारे साथ उस आंदोलन में था

उनकी पैनी याददाश्त मुझे हमेशा चमत्कृत करती थी। अपनी ज़िद पर अड़े रहना उनके व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा था। मुझे हमेशा लगा कि इसी ज़िद ने उन्हें वे मज़बूत पाँव दिए, जिनके बूते वे ताउम्र अपनी पसंद की राह पर चलती रहीं। कभी शांत न होने वाली एक बेचैनी उनमें अक्सर दिखाई देती थी। हर पल उनके भीतर कोई न कोई योजना आकार ले रही होती थी। उसी सिलसिले में वे सहयोगियों को संबंधित लोगों से फोन मिलाने को कहती थीं

दक्षिण दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी स्थित उनका निवास मेरे लिए दूसरे घर जैसा था। इन ग्यारह सालों में कितने ही लोगों ने ज़रूरत के समय उनके घर आश्रय लिया। वे कहा भी करती थीं, "मेरा घर एक कम्यून है।"

अब वह बेचैन जीवन अपनी पूरी परिक्रमा कर चुका है, लेकिन उनकी ऊर्जा ब्रह्मांड में अपनी पूरी सकारात्मकता के साथ आज भी मौजूद है

(लेखिका साहित्यकार-कलाकार हैं)

xoxo

No comments:

Post a Comment