Tuesday, June 26, 2012

Poem of Kabir (کبیر)- Yeh Tun Thath ٹھاٹھ تنبورے کا - Vidya Rao

कबीर का भजन: यह तन ठाठ तंबूरे का
यह तन ठाठ तंबूरे का,
यह तन ठाठ तंबूरे का...
ऐंचत तार मरोड़त खूंटी,
निकसत राग हजूर का।
यह तन ठाठ तंबूरे का...
टूटे तार बिखर गई खूंटी,
हो गया धूल मंतूर का।
यह तन ठाठ तंबूरे का...
या देही का गरब न कीजै,
उड़ गया हंस मंतूर का।
यह तन ठाठ तंबूरे का...
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
पद है अगम हजूर का।
यह तन ठाठ तंबूरे का...
भजन का मुख्य भाव (Meaning)
  • शरीर एक यंत्र है: कबीर कहते हैं कि यह मानव शरीर मिट्टी और सांसों से बना एक तंबूरा है। जब तक इसमें सांसों के तार खिंचे हैं और ईश्वर रूपी उस्ताद इसे बजा रहा है, तब तक इससे जीवन का सुंदर राग (संगीत) निकल रहा है।
  • नश्वरता का संदेश: जैसे ही मौत आती है, इस तंबूरे के तार टूट जाते हैं, खूंटियाँ बिखर जाती हैं और यह सुंदर दिखने वाला शरीर मिट्टी में मिल जाता है।
  • घमंड न करने की सीख: इसलिए इस नश्वर शरीर पर कभी घमंड (गरब) नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब इसके भीतर बैठा 'हंस' (आत्मा) उड़ जाएगा, तो पीछे सिर्फ राख रह जाएगी।
xoxo

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