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Monday, October 3, 2022

Re-blogging a Favorite Memory!

For as long as I can remember, the library has been my sanctuary. From the nostalgic smell of old pages and the familiar thwack of the date stamp to stolen lunch-break visits and bringing my children along with their very first library cards—Nehru Library at CCS HAU has held a lifetime of precious moments.


Nehru Library, CCS HAU, Hisar: A peaceful haven of books and precious memories over the years.


A library card really is a key that opens doors to endless worlds!

To My Readers: Libraries have a quiet way of anchoring our lives across different stages, don't they? Whether it's the thrill of getting a new library card or finding a peaceful corner to read, those memories stay with us.

Do you have a favorite library memory or a library day ritual of your own? I would love to hear your thoughts in the comments below!

Saturday, July 3, 2021

my front yard











this is my front yard retreat

this is the place where I listen to the birds singing,

where I watch the wind play with the green leaves of the majestic trees, if I take the name,papri ,neem ,shisham, bad, bakain, champa, (hindi names)they all are in our front parkand visible sitting in our  frpnt yard.


xoxo

 

Monday, December 16, 2019

BG,हाशिये उलाँघती स्त्री"

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया || 6||
BG 4.5: Although I am unborn, the Lord of all living entities, and have an imperishable nature, yet I appear in this world by virtue of Yogmaya, my divine power.


Photo essay for programme of a book on Hindi  "हाशिये उलाँघती स्त्री" means "Marginalized woman"translated poems of different languages(poets) of India.
the programm was sponsered by Sahitya_Akademi DELHI INDIA


वर्ष 2004 में  रमणिका फ़ाउंडेशन की पत्रिका "युद्धरत आम आदमी" के दो विशेषांकों की योजना रमणिका गुप्ता जी ने बनाई थी। एक विशेषांक भारतीय भाषाओं की स्त्री कविता का और दूसरा स्त्री लेखन (गद्यभाग) का। 

यह निस्संदेह एक बड़ी विशाल व श्रमसाध्य योजना थी। रमणिका जी ' अपने जुझारूपन, कर्मठता  और अतीव उत्साह के लिए भी अपने आप में विशिष्ट उदाहरण हैं।  उन दिनों मेरी बेटी रमणिका गुप्ता के घर पर ही रहा करती थी वह बताती थी कि,  रमणिका जी रात-रात भर बैठ कर प्रूफ देखा करती थीं और विविध भारतीय भाषाओं की हिन्दी में अनूदित हो कर आई कविताओं के पुनर्लेखन की भी आवश्यकता पड़ा करती थी ताकि उन्हें हिन्दी के मुहावरे में सही सही ढाला जा सके। प्राप्त कविताओं में से कुछ कविताओं को उन दिनों रमणिका जी के साथ बैठ कर नए रूप में ढाला, ढलते देखा। 


और परिणामतः "युद्धरत आम आदमी"  का भास्कर संकलन "हाशिये उलाँघती स्त्री" दो खंडों में आ गया   और
26 March 2011 को  इनका लोकर्पक रमणिका फ़ाउंडेशन  "युद्धरत आम आदमी"  और साहित्य अकादमी के तत्वावधान में एक दिवसीय कार्यक्रम भव्य तरिके से सम्पन्न हुआ। देश भर से विभीन प्रांतों से विभिन्न भाषाओं की लेखिकाएं आई और उन्होंने अपनी-अपनी कविताएं पढ़ी. कार्यक्रम में मेरी  फिल्म जगत की हीरोइन 

दीप्ती नवल 

भी आई थी उनकी कविताऐ  भी इस संकलन में संग्रहित थी .रंगकर्मी और लेखिका विभा रानी ने   कविताएं पढ़ी और उन्होंने रमणिका  एक कहानी पर नाटक खेला
  उस कर्यक्रम की कुछ तस्वीरें 
from left P .mahashvari, Geeta Dev,Ramnika Ji, Ashok Vajpai, Anamika Ji , Murgai/

Ramnika Ji on dias





its me and दीप्ती नवल 


its me vibhaa rani and my daughter

Dipti naval with ramnika Gupta on front row

Dipati Naval reciting her poems

Savita jI on dias

xxxxxxxxxxxxxxx

Monday, October 28, 2019

BG, my daughter's interview by rekha sethi

श्रीभगवानुवाच |
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ |
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् || 3||
BG 3.3:The Blessed Lord said: O sinless one, the two paths leading to enlightenment were previously explained by me: the path of knowledge, for those inclined toward contemplation, and the path of work for those inclined toward action.


 interview by 
Rekha Sethi Associate professor at




·         आपके निकट स्त्री-कविता का आशय क्या है ?
-स्त्री-कविता, स्त्री के संपूर्ण व्यक्तित्व की वह रचनात्मक उपस्थिति है, जिसकी आभा में एक चेतना संपन्न स्त्री को पितृसत्तात्मक संरचना में अपने लिए अलहदा स्पेस बनाते हुए देखा जा सकता हैं. इस स्पेस में वह सदियों से ठस सामाजिक रुढियों को अपने से अलग करके, अपने भीतर-बाहर की अनुभूतियों को मुखरता से रख सकती है. स्त्री-कविता ने इसी अलहदा स्पेस में रहते हुए अपने मौलिक अनुभवों के कहन के लिए विशिष्ट मुहावरे गढ़े हैं और कविता में अपनी विशिष्ट शैली निर्मित की है. स्त्री-कविता एक रचनात्मक औज़ार है, जिसके साथ स्त्री उस इलाके के प्रवेश करती है जहाँ का नक्शा उसकी बौद्धिक संरचना की व्यापकता और गहनतम स्तर पर महसूस की जाने वाली संवेदनशील अनुभूतियों को मिलकर बना है.
·         स्त्री होना आपकी कविता को कैसे प्रभावित करता है ? (केवल स्त्री रचनाकारों के लिए)
-स्त्री होना, यानी मानसिक रूप से कई स्तरों पर निरंतर सक्रिय रहना. आज की स्त्री के पास एक बड़ी जिम्मेदारी खुद को सिद्ध करके दिखाने की भी है. समाज उसके स्त्री होने की बार-बार याद दिलाता है इस याद में वे दारुण स्मृतियाँ उसके भीतर अनायास ही प्रवेश कर जाती हैं जिसका संबंध उसकी माँ, दादी समेत नजदीकी स्त्रियों के अनुभवों से हैं. अपने जीवन के अनुभवों के साथ अपनी पूर्ववर्ती स्त्रियों को अपनी कविता में लाना उस वक़्त जरूरी हो जाता है जब समाज के दोयम व्यवहार को महसूस करती हैं. इस तरह एक स्त्री चाह कर भी सिर्फ़ इंसान के तौर पर रचने की कोशिश करने में कभी सफल नहीं हो पाती. क्योंकि समाज ने उसे वह सुविधा कभी प्रदान नहीं की कि वह सिर्फ़ इंसान होकर सोच सके.
जब स्त्री अपने रचनात्मक स्पेस में आती है जहाँ उसे अपने ख्यालों, स्वप्नों और उम्मीदों को रचने की सुविधा है वहां स्वतः ही एक स्त्री होने की दबी टीस बाहर आती है. स्त्री-कविता उसके स्त्री होने का ही पुख्ता और लिखित प्रमाण है.
·         क्या यह आवश्यक है कि स्त्री-कविता की अपनी अलग पहचान हो ?
-आज के इस आइडेंटिटी को प्रमुखता देने वाले दौर में एक स्त्री अपने सृजन में जिन भंगिमाओं को लेकर आती है उसकी अलग बानगी को रचनात्मक स्तर पर दर्ज़ करने के लिए स्त्री –कविता की पहचान होना जरुरी लगता है, स्त्री-कविता के  जरिए ही स्त्री मुक्ति को लेकर चले आ रहे विश्वव्यापी संघर्षो को भी मजबूती मिलती आई है और स्त्री-कविता में बहती चली आ रही स्त्री चेतना की प्रबल महत्ता अलग से रेखांकित होती है. स्त्री के पर्सनल को पॉलिटिकल कहने वाली मुहीम को स्त्री-कविता ने खूब समझा और इसी विधा में उसे मजबूती मिली. स्त्री-कविता ने यह दर्शा दिया कि उसके जीवन- संघर्षों को अब जायदा समय तक राजदार नहीं बने रहने देना है, स्त्री की सृजन प्रक्रिया और संघर्षों का इतिहास दर्ज किया जाना है और एक बौद्धिक स्त्री को सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सक्रिय होना है. अपनी बात खुद कहनी है उसे किसी मिडीऐटर की जरुरत नहीं है. यही कारण है कि किसी भी स्त्री के लेखन के शुरुआत से लेकर गंभीर रचनाकार बनने के सफ़र में उसके व्यक्तित्व के विकास को  पाठक सही से रेखांकित कर सकते हैं. स्त्री-कविता न केवल स्त्री के रोज़मर्रा के संघर्ष और उसके निजत्व की बात करती है वह उसके जागरूक होने के रिकॉर्ड को दर्ज़ भी करती है.
स्त्री के व्यक्तिव का मैग्नेटिक फ़ील्ड व्यापक होता है, समय के साथ एक चेतना संपन्न स्त्री की सोच-समझ में काफी कुछ समाहित होता चलता है. एक इंसान की तरह सोचते समझते हुए भी उसे कभी न कभी स्त्री की तरह सोचने पर विवश होना पड़ता है क्योंकि नकारात्मक अनुभव सिर्फ़ स्त्री होने के कारण ही उसके करीब आ सके है.
स्त्री-कविता, स्त्री के भीतर का वह प्रवाहमय वेग है जिसमें हर तरह के नदी, नाले, झरने समा कर एक हो जाते हैं फिर भी अपनी व्यक्तिगत पहचान कभी खोते नहीं.
·         स्त्री-कविता जैसा अभिधान क्या केवल पाश्चात्य सन्दर्भों से अनुप्रेरित है या भारतीय-दृष्टि भी उसके निर्माण का आधार है ?
-कभी मीराबाई ने अपनी निजता की बात की थी और अपनी पसंद को सार्वजानिक किया था. हर दौर में ऐसे ही किसी स्त्री ने  समाज के बंधन को तोड़ने का जोखिम पाला था. मानव के सर्वाधिक निजी अनुभूति को लेकर सजग स्त्रियाँ, कविता में अपने अधिकारों की मांग करने लगी थी. भारत के दक्षिण में अंडाल, अक्कमहादेवी आदि ने भी अपने जीवन के सरोकारों को मजबूती से रखा फिर बहुत बाद में पश्चिम में स्त्री अधिकारों की बात उठी और संसार भर की स्त्रियों की चेतना ने इस बात को स्वीकारा की अब उनके बोलने का समय आ गया है. स्त्री-कविता ने अपनी शब्दावली गढ़ी और वे अपने साथ नए मुहावरे लेकर आई वे मुहावरे और शब्दावली उनके रोज़मर्रा के जीवन से ही निकले थे, ये स्त्रियाँ अपने जीये हुए को ही लिखती जाती थी. पश्चिम के प्रेरणा लेकर भी हर स्त्री अपने लोकेल में उतरती हैं भारतीय संदर्भों में स्त्री-कविता का आस्वाद थोडा बादल जाता है पर उनके अधिकारों की मांगे तो विश्वव्यापी हैं.
आज के समय में जब एक बड़ी तादाद में स्त्री-कविता लिखी जा रही है तब इसे केवल पाश्चात्य सन्दर्भों से अनुप्रेरित नहीं कहा जा सकता. आधुनिकतावाद की आंधी ने काफी कुछ बदल दिया है और जो एक तरह का खीचड़ी कल्चर बना है उसमे पश्चिम को पश्चिम और पूर्व को पूर्व नहीं रहने दिया है कहीं वे ग्लोबल बन जाता है तो कहीं देसी.

·         आपकी दृष्टि में स्त्री-कविता के मूल मुद्दे क्या हैं ?
-स्त्री कविता में स्त्री के अस्तित्व के महत्व के वे सारे मुद्दे शामिल हैं, जिन्हें हमारी पितृसत्तात्मक संरचना के चलते आज तक किनारे किया गया है. आधुनिक समय में स्त्री के सामने आने वाली सारी चुनौतियां भी इसमें शामिल हो गयी हैं. लेकिन एक सामाजिक इकाई के तौर पर स्त्री की अपनी सशक्त पहचान सबसे बड़ा मुद्दा है. मान अधिकार, शिक्षा, नौकरी मान वेतन आदि. लेकिन मुझे लगता है अपने लिए जिस एकांत की मांग एक रचनात्मक स्त्री कहती आई है वही स्त्री-कविता में भी परिलक्षित होता दीखता है.
आधुनिक समय में स्त्री- कविता में रचनाकारों का यथार्थबोध और उनका अनुभवलोक उतरोत्तर अधिक विस्तृत होता गया है लेकिन काफी पहले से ही स्त्री-कविता के मूल मुद्दे जो रहे हैं वही घूम-फिर कर कविता में आ ही जाते हैं क्योंकि उनका समुचित समाधान नहीं हो पाया है.

·         क्या आपको कभी लगा कि ‘स्त्री-विमर्श’ स्त्री-कविता की संभावनाएँ तलाशने की अपेक्षा उसके लिए एक सीमा बन गया क्योंकि यह जिस तरह कविता को एक विशेष दृष्टिबोध से देखने का आग्रह करता है उससे कविता के अन्य पक्ष चर्चा के केंद्र में आ ही नहीं पाते ?
-जब भी हम किसी विशेष वर्ग को लेकर नई तरह की समीक्षा की मांग करते हैं तो उसमे कई तरह के पूर्वाग्रह अनायास ही शामिल हो जाते हैं इसके लिए नए तरह के आलोचकीय टूल्स इस्तेमाल में लाने होंगे  यही लगता है. जैसे-जैसे स्त्री-कविता अपनी धार तेज़ करती जाएगी वैसे वैसे उसे देखने का नजरिया भी बदलेगा लेकिन इसमें अभी समय लगेगा. हमारे देश में जहाँ स्त्री-विमर्श की परिभाषा को लेकर लोगों में सही धारणा नहीं है वहां अभी स्त्री-कविता को एक विशेष दृष्टिबोध से देखने का आग्रह करना पूरी तरह बेमानी है लेकिन प्रयास तो चलते ही रहेंगे और किसी रोज़ स्त्री-कविता का विशिष्ट डिसिप्लिन होगा.
·         समकालीन कविता की परंपरा में, अपने युग के अन्य कवियों की तुलना में स्त्री रचनाकारों की कविता का मूल्याङ्कन आप कैसे करेंगी ?
-स्त्री कविता में दर्ज़ सरोकारों से ही स्त्री लेखन का मूल्याङ्कन हो सकेगा, एक स्त्री अपने परिवेश को कैसे देखती है अपने संबंधों पर किस तरह रियेक्ट करती है, स्त्री कविता अपनी चेतना को किस तरह एक रास्ते पर लाकर उसे ठोक-पीट रही है और इस ठोक-पीट से समाज के दूसरे पक्ष की ठस धारणाएं टूट रही हैं यह देखा जा सकता है. लेकिन यह भी लगता है कि अभी कठोर मूल्यांकन से बचना चाहिए.

·         क्या आपको लगता है कि हिंदी आलोचना ने स्त्री-रचनाकारों को साहित्य की मुख्यधारा में उचित स्थान नहीं दिया ?
-हाँ यह बिलकुल सही है कि स्त्री-रचनाकारों को दरकिनार किया गया. महादेवी जैसी प्रबुद्ध रचनाकार को सिर्फ़ छायावादी कवयित्री कह कर एक अलग खाके में  रख दिया गया था. आज कुछ हद तक स्थिति सकारात्मक दिशा में ग है पर इस तरफ काफी ध्यान देने की आवश्यकता है.

·         सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से आने वाले समय में स्त्री कविता क्या भूमिका निभाएगी ?
-जब स्त्री-कविता अपने सरोकारों के प्रति गंभीर होगी और अपने हक की बात पुरज़ोर तरीके से रखेगी तब बड़े विमर्शों में स्त्री अपनी पूरी रचनात्मक प्रतिभा और मानवीय सरोकारों के साथ  शामिल होगी और स्त्री- कविता की रचनात्मकता एक एजेंडे की तरह सामने आएगी,  उसके स्त्री के वे सभी मसले शामिल होंगे जिससे लड़ने और निज़ाद पाने के लिए उसने अपने जीवन की ढेर सारी उर्ज़ा खत्म की है.

·         स्त्री कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? क्या हमारा समाज ‘जेंडर सेंसेटिव’ होने की जगह कभी ‘जेंडर न्यूट्रल’ हो सकेगा यानी आप स्त्री हैं या पुरुष इससे कोई अंतर न आये और आपकी पहचान व्यक्ति रूप में हो ?
-लेखन के क्षेत्र में रचनात्मक स्तर पर ‘स्त्री-कविता’ निश्चित रूप से एक ठोस स्पेस क्रिएट करती है, जिसकी आवश्यकता आज के जागरूक समय में स्त्री की अपनी सृजनात्मक उपस्थिति के लिए आवश्यक जान पड़ती है. जिस तरह की हमारी समाजिक संरचना बनी हुई है उसमें समाज के जेंडर न्यूट्रल होने की संभावना तो की जा सकती है, मगर इस तरह की सोच विकसित होने की प्रक्रिया काफी क्षीण है, उसके पीछे हमारे पितृसत्तात्मक समाज की वह संरचना है जिसके तार ढीले होने में समय लगेगा. बरसों से जो बेड़ियाँ स्त्री के पैरों में बंधी हुई हैं और काफी लंबे संघर्ष के बाद ही स्त्री उन्हें ढीला करने में सफल हो सकी है. लगभग वही स्थिति पुरषों के साथ भी है उन्हें स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में पहचानने के लिए एक गंभीर सोशल ट्रेनिंग की आवश्यकता है और इसकी जिम्मेदारी स्त्री और पुरुष दोनों की सामान रूप से है. तभी इस तरह की स्थिति में पहुंचा जा सकेगा जो आदर्श होगी जबकि यही स्थिति एक सामान्य स्थिति होनी चाहिए दुनिया में सांझे विस्तार के लिए.
 XOXO



Tuesday, July 23, 2019

Holy Bhagwad Geeta, makke ki roti .......

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || 25||

BG 2.25: The soul is spoken of as invisible, inconceivable, and unchangeable. Knowing this, you should not grieve for the body.









Mak ke di Roti/ Sarson Ka Sag



Sarson Ka Saag Makke Ki Roti Punjab and Haryana is the right place to be if you want to know what culinery delights are. A typical Indian Punjabi and Haryanvi meal comprises of Sarson ka saag and makke ki roti with a lot of other mouth watering dishes. However sarson ka saag is a world famous delicacy that activates one's taste buds and leaves you asking for more. Sarson ka saag is a luscious green gravy, made out of mustard seeds. Cooked with masalas and enhanced with oil seasoning, this dish is relished countrywide. Sarson ka saag is often accompanied by Indian bread- Makki ki roti (corn bread). They both compliment and eachother and the roti is presented with a dash of ghee, that makes it a total delight to relish! 



My daughter perhaps unwilling to this traditional meal 
tastes like sore medicine














































Have a taste of this delicacy in states like Delhi, Haryana and Punjab.


Nutritional and medicinal uses of maize grains:
•             Corns contain antioxidant Ferulic acid that can control the free radicals in the body and protect against cancer of breast and liver. In addition corns contain beta carotene and beta cryptoxanthin which help in fighting against lung and oral cancers.
•             Corns are natural resources of fiber and therefore control blood cholesterol and protect the cardiovascular system against diseases.
•             If corns are regularly consumed controls type I and II diabetes by regulating the blood sugar levels.
Since corns contain natural fiber eating corns help digestion, prevent constipation thereby formation of piles.
•             Corns contain Thiamine (Vitamin B) hence help in maintaining the nervous system healthy. It is said that deficiency of Thiamine is responsible for development of Alzheimer’s disease. In addition corns contain minerals required for the body.
xoxo

Thursday, January 1, 2015

My poet daughter is amazing............

''हमारे सपनों के हिस्से कपास के सफ़ेद फूल ही आए''
विपिन चौधरी का एकल कविता-पाठ
''दुनिया के सारे गुलाब
हमने प्रेमियों को थमा दिए
गुलमोहर
कठफोड़वों को
सफ़ेद फूल
मुर्दों की तसल्ली के लिए रख छोड़े
गुलदाउदी के फूलों ने
हमारी सर्दी का इलाज किया
चीड़ की टहनियों से
कुर्सी मेज़ बना दिए
सूरजमुखियों को इकट्ठा कर
तेल कारख़ाने भेज दिया
कमल
लक्ष्मी के चरणों में चढ़ा दिए
हमारे सपनों के हिस्से कपास के सफ़ेद फूल ही आए
और आँख खुली तो सिर्फ़
फूल झड़ी टहनियाँ!''
यह कविता ‘कपास के फूल’ हिन्दी की सुपरिचित कवयित्री विपिन चौधरी की एक ऐसी कविता है जिससे कविता की ज़मीन और उससे जुड़े तमाम सरोकारों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का परिचय मिलता है।
विपिन चौधरी अपनी कविताओं का पाठ, हिन्दी की महत्त्वपूर्ण रचनाशीलता को अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित एकल काव्य-पाठ कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत कर रही थीं। ‘हुत’ की तरफ़ से यह आयोजन रविवार, 21 दिसम्बर, 2014 को सायं 4.00 बजे से एनडीएमसी पार्क, अबुल फज़ल रोड, नियर तिलक ब्रीज रेल्वे स्टेशन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में किया गया था।
अपने कविता-पाठ में विपिन चौधरी ने---
‘पुरानेपन का मान रखते हुए’, ‘पतंग उड़ाती माँ’, ‘पीछे छूटा हुआ प्रेम’, ‘इंतज़ार’, ‘दुःख के पत्थर होने से पहले’, ‘इंसान अपने क़द जितना प्रेम करता है’, ‘पुराने दिन’, ‘पेड़’, ‘प्रतिसंसार’, ‘गुलाब के फूल’, ‘जल’, ‘कुछ नहीं था तब भी’, ‘जीवन भीतर जीवन’, ‘ज़रूरी चीज़ें’, ‘धरती पर पहले पहल’, ‘दूरियाँ’, ‘मुट्ठी में क़ैद यादें’, ‘सर्दी और याद’, ‘चोर दरवाज़े’, ‘ज़्यादातर मैं सत्तर के दशक में रहा करती हूँ’, ‘कपास के फूल’ सहित लगभग अपनी तीस कविताएँ प्रस्तुत कीं।
दिल्ली की भयानक ठंड के बीच विपिन चौधरी की कविताओं की यह तासीर ही थी कि श्रोता जैसे अलाव के चारों तरफ बैठे रहे और कविताओं की आँच को जीते रहे। ‘हुत’ की गोष्ठी में यह पहली बार था कि श्रोता दिल्ली की ठंड ही नहीं बल्कि दिल्ली की ठंडी बौद्धिकता के भी विरुद्ध गोलबंद नज़र आए ।
हिन्दी में तमाम कवियों के बीच अलग से पहचानी जानी कवयित्री विपिन चौधरी की कविताओं को हिन्दी के महत्त्वपूर्ण युवा कवि आर. चेतन क्रान्ति ने काफ़ी सराहा। वहीं चर्चित युवा कवि अरुणाभ सौरभ ने विचार व्यक्त किया कि विपिन चौधरी की स्मृतियों और यर्थाथ को रचने की कलात्मकता गहरे प्रभावित करती है। चीज़ों की जड़ों तक पहुँचने की दृष्टि इनकी अपनी है जिससे ये जीवन, घर-परिवार, समाज और देश-दुनिया की तमाम विसंगतियों को रचने के साथ-साथ, प्रेम में छल-छद्म को भी रचने में एक नई बानगी पेश करती हैं।
पत्राकार उमेश सिंह ने रेखांकित किया कि विपिन चौधरी की कविताओं में प्रकृति और प्रेम का अद्भुत सामंजस्य है। युवा कथाकार-पत्राकार सुशील सांकृत्यायन ने कहा कि इनकी कविताएँ युवाओं की दुनिया को इस तरह रचती हैं कि वह सहज ही अपनी लगने लगती है। लगता है जैसे कोई हमारी ही बात अपनी कविताओं में कह रहा। आज हिन्दी कविता में एक कवयित्री का ऐसा लेखन कम ही दिखता है। वहीं युवा कवि गुफरान ने उल्लेख किया कि कम-से-कम शब्दों में अपनी बात को मुकम्मल अंजाम देना विपिन चौधरी की कविताओं की एक बड़ी ख़ासियत है। साहित्यिक पत्रिका ‘भोर’ की सहयोगी बबिता उप्रेती ने विपिन चौधरी की कविताओं की व्यापकता को लक्षित करते कहा कि इनकी कविताएँ पितृसत्तात्मक पेंचों को खोलती हैं। स्त्री की संघर्ष-चेतना प्रभावित ही नहीं करती सोचने पर भी मजबूर करती है।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे युवा कवि और साहित्यिक पत्रिका ‘रू’ के सम्पादक कुमार वीरेन्द्र ने विचार व्यक्त किया कि विपिन चौधरी एक ऐसी कवयित्री हैं जिनकी कविताओं में सिर्फ़ एक स्त्री की नहीं बल्कि विभिन्न कैरेक्टरों की अभिव्यक्ति है। इनकी कविताओं का अंतरगुंफन कुछ ऐसा है जिसे समझना तो मुश्किल है ही, उसे रचना तो और भी कठिन है लेकिन विपिन चौधरी की कविताओं ने इसे कर दिखाया है, वह भी मूर्त रूप में बेबाक ढंग से। कथ्य और शिल्प को साधते बेचैनी की भाषा की रचना करना इस कवयित्री के कला-पक्ष का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। एक खोए हुए लोक की खोज और एक नए लोक के सृजन में विविन चौधरी की क़लम की भागीदारी दूर से और देर तक दिखने जैसी है।
‘हुत’ के संयोजक और युवा कवि इरेन्द्र बबुअवा ने इस आयोजन पर कहा कि दिसम्बर की इस ठंड में यह एक यादगार आयोजन है और इसको सफल बनाने का श्रेय दिल्ली की युवा रचनाशीलता को है। कार्यक्रम में युवा रचनाकार अतुल प्रसन्न, रंजना बिष्ट, पूर्णिमा सिंह, अश्विनी कुमार आदि की सक्रिय भागीदारी रही।
प्रस्तुति---विद्या सागर पांडेय
ज़्यादातर मैं सत्तर के दशक में रहा करती हूँ
सत्तर की फिल्मों का दिया भरोसा कुछ ऐसा है कि मैं
अपने कंधे पर पड़े अकस्मात
धौल-धप्पे से चौंकती नहीं हूँ मैं
भीड़-भरे बाजार में
बरसों बिछड़ी सहेलियां मिल जाया करती हैं
खोयी मोहब्बत दबे पाँव आ धमकती है
पीले पड़ चुके पुराने प्रेम-पत्रों में
उस दौर की फिल्मों ने अपने पास बैठा कर यही समझाया
भरे-पूरे दिन के बीचोबीच
बदन पर चर्बी की कई तहें ओढे
एक स्त्री मुझे देख कर तेज़ी से करीब आती है
और टूट कर मिलती है
मुड़कर थोडी दूर खड़े अपने शर्मीले पति से कहती है
-सुनो जी मिलो मेरी बचपन की अज़ीज़ सहेली से
और मैं हूँ कि
अपने पुराने दिनों में लौटने की बजाये
बासु दा की फिल्म के उस टुकड़े में गुम हो जाती हूँ
जहाँ दो पुरानी सहेलियां गलबहियां डाले भावुक हो रही हैं
बस स्टॉप पर 623 की बस का इंतज़ार करते वक़्त
अमोल पालेकर तो कभी विजेंदर घटगेनुमा युवक अपने पुराने मॉडल का
लम्ब्रेटा स्कूटर
मेरी तरफ मोड़ते हुए लगा है
फिल्म 'मिली' के भोंदू अमिताभ का
मिली 'कहाँ मिली थी' वाला वाक्या आज भी साथ चलता है
ताज्जुब नहीं कि
डिज़ाइनर साड़ियों के शो रूम में
(विद्या सिन्हा की ट्रेड मार्क) बड़ी-बड़ी फूलों वाली साड़ियाँ तलाशने लगती हूँ
मूँछ-मुंडा श्ब्द पर बरबस ही उत्पल दत्त सामने मुस्तैद हो जाते हैं
भीड़ में सिगरेट फूंकता
दुबला-पतला दाढ़ीधारी आदमी दिनेश ठाकुर का आभास देने लगता है
हर साल सावन का महीना
घुंघरुओं-सी बजती बूंदों की सरगम छेड़ देता है
और मैं 1970 को रोज़ थोडा-थोडा जी लेती हूँ
श्याम बेनेगल की नमकीन काजू भुनी हुई फिल्में
देर रात देखा करती हूँ
मेरी हर ख़ुशी का रास्ता उन्नीस सौ सत्तर से हो कर आता है
अपने हर दुःख की केंचुली को
उस पोस्टर के नीचे छोड़ आती हूँ
जहाँ रोटी कपडा और मकान के पोस्टर में मनोज कुमार मंद-मंद मुस्कुराते
हुए खड़े हैं
और नीचे लहरदार शब्दों में लिखा है
'मैं ना भूलूंगा इन रस्मों इन कसमों को'
गायक, मुकेश!
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Sunday, November 16, 2014

My daughter's poems.

On Monday, Oct 20, 2014 there was a poem recital event at  India Habitat Centre(Lodhi Road)
I found it  here   on  the  site it  was like this…………..
Enjoy an evening of poetry recital by eminent poets like Jitendra Srivastava, Umashankar Chaudhary, Vipin Chaudhary, and Vimal Kumar. All the poets write on different themes like love, historical, and political satire. The potery recital will be followed by an interactive session where they will be read more
My daughter reciting her poems at  India Habitat Centre








Again a poet recital event at jnu in collaboration with sahitya-akademi my daughter and two others 

Reciting her poems in JNU


My daughter in JNU on * NOV,2014




xoxox